कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १०८-११० : अ० ५ ] यान और सामवायिक सम्बन्धी विचार ४७१
(१) यातव्ययौगपद्ये गुरुव्यसनं न्यायवृत्तिं लघुव्यसनमन्यायवृत्तिं विरक्तप्रकृतिं वेति, विरक्तप्रकृतिं यायात् । गुरुव्यसनं न्यायवृत्तिमभियुक्तं प्रकृतयोऽनुगृह्णन्ति । लघुव्यसनमन्यायवृत्तिमुपेक्षन्ते । विरक्ता बलवन्तमप्यु-च्छिन्दन्ति । तस्माद्विरक्तप्रकृतिमेव यायात् । (२) क्षीणलुब्धप्रकृतिमपचरितप्रकृतिं वेति—क्षीणलुब्धप्रकृतिं यायात् । क्षीणलुब्धा हि प्रकृतयः सुखैनोपजापं पीडां वोपगच्छन्ति, नापचरिताः प्रधानावरग्रहसाध्या इत्याचार्याः । नेति कौटिल्यः—क्षीणलुब्धा हि प्रकृतयो भर्तरि स्निग्धा भर्तृहिते तिष्ठन्ति । उपजापं वा विसंवादयन्ति, अनुरागे सार्वगुण्यमिति । तस्मादपचरितप्रकृतिमेव यायात् ।
पहिले लघु व्यसन शत्रु पर ही चढ़ाई करनी चाहिए, क्योंकि उस पर यदि चढ़ाई न की जायेगी तो अपने छोटे से व्यसन का शीघ्र ही सरलता से प्रतीकार कर वह यातव्य की सहायता के लिए तैयार हो जायेगा; अथवा पाष्णिग्राह ( पीछे से आक्रमण करने वाला ) बन जायेगा ।
( १ ) न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करने वाला भारी विपत्ति से ग्रस्त यातव्य, अन्यायपूर्वक प्रजा का पालन करने वाला थोड़ी विपत्ति से ग्रस्त यातव्य, और जिसका प्रकृति-मण्डल विरक्त हो गया हो, ऐसा यातव्य इस प्रकार के तीन यातव्य यदि एक साथ प्राप्त हों तो उनमें सर्वप्रथम विरक्त-प्रकृति यातव्य पर ही चढ़ाई करनी चाहिए । क्योंकि यदि न्यायपरायण गुरु-व्यसनी यातव्य पर पहिले आक्रमण किया जायगा तो उसका प्रकृतिमण्डल प्राण-प्रण से उसकी सहायता करेगा; इसी प्रकार अन्यायवृत्ति लघु-व्यसनी यातव्य पर पहिले आक्रमण किया जायेगा तो उसका प्रकृति-मंडल न तो उसकी सहायता करेगा और न विरोध ही । इनके विपरीत विमुख हुआ प्रकृति-मण्डल बलवान् राजा को भी उखाड़ फेंकता है । इसलिये विरक्त प्रकृति यातव्य पर ही पहिले आक्रमण करना चाहिए ।
( २ ) 'दुर्भिक्ष आदि विपत्तियों से पीड़ित और लोभी प्रकृति-मण्डल से युक्त यातव्य पर पहिले चढ़ाई करनी चाहिए या तिरस्कृत प्रकृति-मण्डल वाले यातव्य पर पहिले चढ़ाई करनी चाहिए, ऐसी अवस्था में 'विपत्तिग्रस्त लोभी प्रकृति-मण्डल से घिरे हुए यातव्य पर ही पहिले चढ़ाई करनी चाहिए; क्योंकि पीडित एवं लोभी प्रकृति-मण्डल सरलता से काबू में किया जा सकता है । किन्तु तिरस्कृत प्रकृति-मण्डल को बहकाना या सताना कठिन है, क्योंकि वे किसी की बात मानने के लिए तभी राजी होते हैं, जब उनका प्रधान उस बात को स्वीकार करे ।' पूर्वाचार्य ऐसा कहते हैं । किन्तु आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'पीड़ित एवं लोभी प्रकृतिजन अपने मालिक में बड़ा अनुराग रखते हैं और उसके हितार्थ वे हर समय तैयार रहते हैं;