कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 561, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १११ | # संहितप्रयाणिकं परिपणितापरि-पणितापसृतसन्धयश्च |
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| अध्याय ६ |
(१) विजिगीषुद्वितीयं प्रकृतिमेवातिसन्दध्यात् । सामन्तं संहित-प्रयाणे योजयेत्—'त्वमितो याहि, अहमितो यास्यामि, समानो लाभ' इति । (२) लाभसाम्ये सन्धिः । वैषम्ये विक्रमः । (३) सन्धिः परिपणितश्चापरिपणितश्च । (४) 'त्वमेतं देशं याह्यहमिमं देशं यास्यामी'ति परिपणितदेशः । (५) 'त्वमेतावन्तं कालं चेष्टस्व, अहमेतावन्तं कालं चेष्टिष्य' इति । परिपणितकालः । (६) 'त्वमेतावत्कार्यं साधय, अहमेतावत्कार्यं साधयिष्यामीति' परिपणितार्थः ।
सामूहिक प्रयाण और देश, काल तथा कार्य के अनुसार संधियाँ
( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि अपने पड़ोसी दुश्मन राजा ( द्वितीय प्रकृति ) को नीचा दिखाने के लिए सहप्रयाण में वह उससे कहे कि 'आप इधर से आक्रमण करें और मैं इधर से । दोनों ओर से जो भी लाभ होगा हम दोनों का उसमें बराबर हिस्सा होगा ।'
( २ ) यदि दोनों ओर में समान लाभ हो तो विजिगीषु को चाहिये कि वह दूसरे समशक्ति सहयोगी से सन्धि कर ले । यदि विजिगीषु को अधिक लाभ हो तो उससे लड़ाई कर दे ।
( ३ ) सन्धि दो प्रकार की होती है । परिपणित ( जो देश, काल या कार्य की शर्त लगाकर की जाती है ) और अपरिपणित ( जिसमें देश, काल या काये की अपेक्षा नहीं रहती है ) ।
( ४ ) 'तुम इस देश पर चढ़ाई करो और मैं उस देश पर' इस प्रकार निश्चित देश का निर्देश कर जो सन्धि की जाती है उसको परिपणित देश सन्धि भी है ।
( ५ ) 'तुम इतने समय तक कार्य करते रहो और मैं इतने समय तक' इस प्रकार निश्चित समय का निर्देश करके जो सन्धि की जाती है उसको परिपणित काल सन्धि कहते हैं ।
( ६ ) 'तुम इतना कार्य करो और मैं इतना कार्य करूँगा' इस प्रकार निश्चित