कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) यदि वा मन्येत—‘शैलवननदीदुर्गमटवीव्यवहितं छिन्नं धान्य-पुरुषवीवधासारमप्रवसेन्धनोदकमविज्ञातं प्रकृष्टमन्यभावदेशीयं वा सैन्य-व्यायामानामलब्धभौमं वा देशं परो यास्यति विपरीतमहम्’ इत्येतस्मिन् विशेषे परिपणितदेशं सन्धिमुपेयात् । (२) यदि वा मन्येत—‘प्रवृष्णोष्णशीतमतिव्याधिप्रायमुपक्षीणाहारोप-भोगं सैन्यव्यायामानां चौपरोधिकं कार्यसाधनानामूनमतिरिक्तं वा कालं परश्चेष्टिष्यते, विपरीतमहम्’ इति, तस्मिन्विशेषे परिपणितकालं सन्धि-मुपेयात् । (३) यदि वा मन्येत--‘प्रत्यादेयं प्रकृतिकोपकं दीर्घकालं महाक्षयव्यय-मल्पमनर्थानुबन्धमकल्पमधर्म्यं मध्यमोदासीनविरुद्धं मित्रोपघातकं वा कार्यं परः साधयिष्यति, विपरीतमहम्’ इति तस्मिन् विशेषेपरिपणितार्थं सन्धि-मुपेयात् ।
कार्य का निर्देश करके जो सन्धि की जाती है उसको परिपणित कार्य सन्धि कहते हैं ।
(१) विजिगीषु राजा यदि समझे कि ‘जिस देश में पहाड़ों, जंगलों और नदियों के किनारे पर बड़े-बड़े किले हों; जहाँ तक पहुँचने में भयानक जंगलों को पार करना पड़े; जहाँ दूसरे देश से धान्य, पुरुष आदि सामान तथा अपनी मित्र सेना को न लाया जा सके; जहाँ घास, लकड़ी एवं पानी न मिले; जिसका भौगोलिक ज्ञान पूर्णतया प्राप्त न हो; बहुत दूर हो; जहाँ की प्रजा राजभक्त न हो; इत्यादि कारणों से कठिनाई से वश में आने वाले देश पर दूसरा सामन्त राजा आक्रमण करेगा और मैं सुगमता से वश में आ जाने वाले देश पर आक्रमण करूँगा’ ऐसी स्थिति होने पर परिपणित देश सन्धि कर ले ।
(२) अथवा यदि वह समझे कि ‘वर्षा गर्मी तथा सर्दी के मौसम में; जिन दिनों बीमारी का भय रहता है; जब खाने-पीने के लिए ठीक तरह से सामान न मिलता हो; जहाँ सेना की कवायद ठीक तरह से न हो सकती हो; विजय प्राप्त करने में सामन्त को काफी समय लगाना पड़ेगा; लेकिन मुझे काल सम्बन्धी बाधायें न झेलनी पड़ेंगीं’—ऐसे विशेष कारणों के उपस्थित होने में परिपणित काल सन्धि कर ले ।
(३) अथवा यदि देखे कि ‘शत्रु प्रकृति को कुपित कर देने वाले, विलंब से सिद्ध होने वाले, पुरुषों का नाश करने वाले, धन का अपव्यय करने वाले, थोड़े किन्तु भविष्य में अनर्थकारी, कष्ट से सम्पादित होने वाले, अधर्म से युक्त, मध्यम तथा उदा-सीन राजाओं के विरुद्ध मित्रों के लिए कष्टकर; इत्यादि जितने कार्य हैं उनको दूसरा सामन्त पूरा करेगा और मैं इनसे विपरीत कार्य करूँगा’ तो इस विशेष स्थिति में परिपणितार्थ सन्धि कर ले ।