कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १११ : अ० ६ ] प्रयाण और सन्धियाँ ४७९
(१) एवं देशकालयोः कालकार्ययोर्देशकार्ययोर्देशकालकार्याणां चावस्थापनात्सप्तविधः परिपणितः । तस्मिन् प्रागेवारभ्य प्रतिष्ठाप्य च स्वकर्मणि परकर्मसु विक्रमेत ।
(२) व्यसनत्वरावमानालस्ययुक्तमज्ञं वा शत्रुमतिसन्धायकामो देशकालकार्याणामनवस्थापनात् । 'संहितौ स्वः' इति सन्धिविश्वासेन परच्छिद्रमासाद्य प्रहरेत् । इत्यपरिपणितः ।
(३) तत्रैतद्भवति—
सामन्तेनैव सामन्तं विद्वानायोज्य विग्रहे ।
ततोऽन्यस्य हरेद्भूमिं छित्त्वा पक्षं समन्ततः ॥
(४) सन्धेरकृतचिकीर्षा कृतश्लेषणं कृतविदूषणमवशीर्णक्रिया च । विक्रमस्य प्रकाशयुद्धं, कूटयुद्धं, तूष्णींयुद्धम् । इति सन्धिविक्रमो ।
(५) अपूर्वस्य सन्धेः सानुबन्धैः सामादिभिः पर्येषणं समहीनज्यायसां च यथाबलमवस्थापनमकृतचिकीर्षा ।
(६) कृतस्य प्रियहिताभ्यामुभयतः परिपालनं यथासम्भाषितस्य च
( १ ) इसी प्रकार देशकाल, कालकार्य, देशकार्य और देशकालकार्य इन चार सन्धियों को उक्त तीन सन्धियों से मिला देने पर परिपणित सन्धि के सात भेद हुए । विजिगीषु को उचित है कि वह परिपणित सन्धि कर लेने पर पहिले अपने कार्यों को प्रारम्भ करे और उन्हें पूरा कर दे; उसके बाद शत्रु के दुर्ग आदि कार्यों पर चढ़ाई करे ।
( २ ) विजय की इच्छा रखने वाले राजा को चाहिए कि वह, मद्य, द्यूत, आदि व्यसनों से, जल्दी से, तिरस्कार से और आलस्य से युक्त अविचारशील शत्रु राजा के साथ देश, काल तथा कार्य का कुछ भी निश्चय न करके 'हम दोनों आपस में सन्धि करते हैं' ऐसा कहकर सन्धि के बहाने उस पर अपना विश्वास जमाकर तथा उसके दोषों का पता लगाकर फिर आक्रमण कर दे — इसको अपरिपणित सन्धि कहते हैं ।
( ३ ) विचारशील एवं विद्वान् विजिगीषु को चाहिए कि सन्धि कर लेने के बाद वह एक सामन्त के साथ दूसरे सामन्त को लड़ा दे और यातव्य की मित्रप्रकृति को नष्ट करके यातव्य की भूमि को अपने कब्जे में कर ले ।
( ४ ) सन्धि के चार धर्म हैं : १. अकृतचिकीर्षा, २. कृतश्लेषण ३. कृतविदूषण तथा ४. अवशीर्णक्रिया । इसी प्रकार विग्रह के भी तीन धर्म हैं : १. प्रकाशयुद्ध २. कूटयुद्ध और ३. तूष्णीयुद्ध ।
( ५ ) साम, दाम आदि उपायों से नई सन्धि करना और उसके अनुसार ही छोटे, बड़े तथा समान राजाओं के अधिकारों का पूरा ध्यान रखना अकृतचिकीर्षा नामक संधिधर्म है ।
( ६ ) जो सन्धि की जाय उसको अच्छे तथा हितकर आचरणों द्वारा बनाये