कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
निबन्धनस्यानुवर्तनं रक्षणं च । 'कथं परस्मान्न भिद्येत' इति कृतश्लेषणम् । (१) परस्यापसन्धयेतां दूष्यातिसन्धानेन स्थापयित्वा व्यतिक्रमः कृत-विदूषणम् । (२) भृत्येन मित्रेण वा दोषापसृतेन प्रतिसन्धानमवशीर्णक्रिया । (३) तस्यां गतागतश्चतुर्विधः—कारणाद्गतागतः, विपरीत:, कारणा-द्गतोऽकारणादागतः, विपरीतश्चेति । (४) स्वामिनो दोषेण गतो गुणेनागतः परस्य गुणेन गतो दोषेणागत इति कारणाद्गतागतः सन्धेयः । (५) स्वदोषेण गतागतो गुणक्षुभयोः परित्यज्य अकारणाद्गतागतश्चल-बुद्धिरसन्धेयः । (६) स्वामिनो दोषेण गतः, परस्मात्स्वदोषेणागत इति कारणाद्गतो-ऽकारणादागतस्तर्कयितव्यः—'परप्रयुक्तः स्वेन वा दोषेणापकर्तुकामः, पर-स्योच्छेत्तारममित्रं मे ज्ञात्वा प्रतिघातभयादागतः, परं वा मामुच्छेत्तुकामं
रखना और पूर्व समझौते के अनुसार सब शर्तों की पूरी तरह रक्षा करते रहना ही कृतश्लेषण नामक सन्धिधर्म है।
( १ ) राजद्रोही दूष्य के साथ सन्धि करके विजिगीषु के साथ हुई सन्धि को तोड़ देना कृतविदूषण नामक सन्धिधर्म है।
( २ ) किसी दोष के कारण बहिष्कृत भृत्य या मित्र के साथ विजिगीषु का फिर से सन्धि कर लेना अवशीर्ण नामक सन्धिधर्म है।
( ३ ) यह गतागत ( अवशीर्णक्रिया ) चार प्रकार का होता है। १. किसी कारण-विशेष से अलग होना और फिर किसी कारणविशेष से मिल जाना, २. बिना ही कारण के अलग होना और बिना ही कारण फिर आकर मिल जाना, ३. किसी कारण विशेष से अलग होना और अकारण ही फिर मिल जाना, ४. अकारण ही अलग होना और किसी कारण विशेष से फिर मिल जाना।
( ४ ) अपने मालिक के दोष से अलग होना और मालिक के ही गुण से फिर मिल जाना; शत्रु के गुणों के कारण मालिक को छोड़ देना और शत्रु के दोषों के कारण फिर मालिक से मिल जाना। यह जाना-आना कुछ कारणों से होता है; इस लिए पुनः सन्धि करने के योग्य है।
( ५ ) स्वामी और शत्रु के गुणों को न समझकर अपने ही दोष के कारण स्वामी को छोड़ कर चले जाने वाले और अपने ही दोष के कारण शत्रु को छोड़ कर फिर स्वामी से मिल जाने वाले चञ्चल बुद्धि व्यक्ति सन्धि करने योग्य नहीं हैं।
( ६ ) स्वामी के दोष से शत्रु के आश्रय में गये हुए तथा अपने दोष से स्वामी के पास लौटे हुए—कारण से गत और अकारण ही आगत—व्यक्ति की जाँच इस