कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १११ : अ० ६ ] प्रयाण और सन्धियाँ ४८१
परित्यज्यान् शंस्यादागतः’ इति ज्ञात्वा कल्याणबुद्धिं पूजयेदन्यथाबुद्धिमपकृष्टं वासयेत् । (१) स्वदोषेण गतः परदोषेणागतः इत्यकारणाद्गतः कारणादागतस्तर्कयितव्यः—'छिद्रं मे पूरयिष्यति, उचितोऽयमस्य वासः, परत्रास्य जनो न रमते, मित्रैर्मे संहितः, शत्रुभिर्विगृहीतः, लुब्धक्रूरादाविग्नः, शत्रुसंहिताद्वा परस्माद्' इति । ज्ञात्वा यथाबुद्धयवस्थापयितव्यः । (२) कृतप्रणाशः शक्तिहानिर्विद्यापण्यत्वमाशानिर्वेदो देशलौल्यमविश्वासो बलवद्विग्रहो वा परित्यागस्थानमित्याचार्याः । भयमवृत्तिरमर्ष इति कौटिल्यः । (३) इहापकारी त्याज्यः । परापकारी सन्धेयः । उभयापकारी तर्कयितव्य इति समानम् ।
प्रकार करनी चाहिए : क्या यह शत्रु की प्रेरणा से मेरा अपकार करने के लिए तो नहीं आया है ? या मेरे द्वारा किये गये अपकार का बदला लेने के लिए तो नहीं आया ? या अपने वध के भय से तो यहाँ नहीं चला आया है ? या मेरे स्नेह के कारण फिर मेरे पास तो नहीं चला आया है ? यदि वह कल्याणकामना से आया हो तो उसका सत्कार करे अन्यथा उससे दूर ही रहे ।
( १ ) अपने दोष से स्वामी को छोड़कर गये हुए और शत्रु के दोष से पुनः वापिस आये हुए—अकारण गत और सकारण आगत—व्यक्ति की जाँच इस प्रकार करनी चाहिए; यहाँ आकर वहाँ मेरे दोषों को तो नहीं फैलायेगा ? या इस देश का निवास अनुकूल जानकर तो नहीं आया है ? अथवा अपने स्त्री-पुत्रों की अनिच्छा से तो वह परदेश छोड़कर नहीं आया है ? या मेरे मित्रों के साथ तो इसने सन्धि नहीं कर ली है ? या शत्रुओं ने तो इसका कुछ अपकार नहीं किया है ? अथवा यह लोभी एवं क्रूर शत्रु संघ से नहीं घबड़ा गया है ? इन बातों को जानकर यदि कल्याण बुद्धि समझे तो रख ले अन्यथा उसको दूर भगा दे ।
( २ ) पूर्वाचार्यों का मत है कि 'जो कृतज्ञ न हो; जिसकी शक्ति गल गयी हो; जिसके राज्य में वस्तुओं की तरह विद्या का विक्रय होता हो; जो आशान्वित होकर निराश हो गया हो, जिसके देश में उपद्रव होते हों, जो नौकरों पर विश्वास न करता हो अथवा बलवान् राजा से जो विरोध किये हुए हो,' ऐसे राजा का परित्याग करना चाहिए । किन्तु कौटिल्य का कथन है कि 'परित्याग उसी राजा का करना चाहिए, जो डरपोक, किसी कार्य को आरम्भ न करने वाला और क्रोधी स्वभाव का हो ।'
( ३ ) गतागत पुरुष के सम्बन्ध में इतना ध्यान और रखना चाहिए कि जो अपना ( राजा का ) अपकार करके जाये और शत्रु का बिना अपकार किये ही वापिस
३१ कौ०