भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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४८२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवाँ अधिकरण

(१) असन्धेयेन त्ववश्यं सन्धातव्ये यतः प्रभावः ततः प्रतिविदध्यात् । (२) सोपकारं व्यवहितं गुप्तमायुःक्षयादिति । वासयेदरिपक्षीयमवशीर्णक्रियाविधौ ॥ (३) विक्रामयेद्धूर्तंरि वा सिद्धं वा दण्डचारिणम् । कुर्यादमित्राटवीषु प्रत्यन्ते वान्यतः क्षियेत् ॥ (४) पण्यं कुर्यादसिद्धं वा सिद्धं वा तेन संवृतम् । तस्यैव दोषेणादूष्यं परसन्धेयकारणात् ॥ (५) अथवा शमयेदेनमायत्यर्थमुपांशुना । आयत्यां च वधप्रेप्सुं दृष्ट्वा हन्याद्गतागतम् ॥ (६) अरितोभ्यागतो दोषः शत्रुसंवासकारितः । सर्पसंवासधार्मित्वान्निन्द्यतोद्वेगेन दूषितः ॥


चला आये, उसको पुनः आश्रय न दिया जाय; और जो शत्रु का अपकार करके आया हो उसे ग्रहण कर लिया जाय । जो दोनों का ही अपकार करने वाला हो उसकी अच्छी तरह जाँच करके उसको रखा जाय या दूर कर दिया जाय ।

( १ ) जो व्यक्ति सन्धि करने के योग्य नहीं है, यदि विशेष परिस्थितिवश उससे सन्धि करनी पड़े तो शत्रु के जिन कारणों से वह व्यक्ति प्रभावित हो, पहिले उनका प्रतीकार किया जाय ।

( २ ) यदि शत्रुपक्ष का कोई व्यक्ति अपने आश्रय में रहकर किसी कारण शत्रु के आश्रय में चला जाय और वहाँ से पुनः वापिस चला आये तो ऐसे गतागत को कुछ विशेष सन्धि-नियमों पर ही पुनः प्रश्रय दिया जाना चाहिए । ऐसे व्यक्ति को किसी विश्वस्त भृत्य की देख-रेख में आयु पर्यन्त आश्रय दिया जाय ।

( ३ ) यदि वह निष्कपट सावित हो जाय तो उसे स्वामी की परिचर्या में नियुक्त किया जाय । वहाँ भी निष्कपट जँचे तो उसे सेना-विभाग में नियुक्त किया जाय या आटविकों के मुकाबले में अथवा कहीं दूर प्रदेश में नियुक्त किया जाय ।

( ४ ) यदि नियुक्त स्थान पर वह कपटपूर्ण व्यवहार करे तो व्यापार का बहाना करके उसे शत्रुदेश में भेज दिया जाय और इस बहाने से शत्रु के साथ सन्धि करके उसी के दोष से उसको मरवा दिया जाय ।

( ५ ) यदि भविष्य में किसी प्रकार के उपद्रव की आशंका न हो तो उसको चुपचाप मरवा दिया जाय । भविष्य में वध करने की इच्छा रखने वाले गतागत को तो देखते ही मरवा देना चाहिए ।

( ६ ) शत्रु के आश्रय से आया हुआ व्यक्ति, शत्रु-सहवास के कारण बड़ा जहरीला है, क्योंकि शत्रु-सहवास साँप के सहवास के समान है । इसलिए ऐसा व्यक्ति निंदित कहा गया है ।