कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 567, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० १११ : अ० ६ ] प्रयाण और सन्धियाँ ४८३
(१) जायते प्लक्षबीजाशात् कपोतादिव शाल्मलेः । उद्वेगजननो नित्यं पश्चादपि भयावहः ॥ (२) प्रकाशयुद्धं निर्दिष्टो देशे काले च विक्रमः । विभीषणमवस्कन्दः प्रमादव्यसनार्दनम् ॥ एकत्र त्यागघातौ च कूटयुद्धस्य मातृका । योगगूढोपजापार्थं तूष्णींयुद्धस्य लक्षणम् ।
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे संहितप्रयाणिकं परिपणितापरिपणितापसृतादि-सन्धिर्नाम षष्ठोऽध्याय, आदितस्त्रिशततमः ।
—: ० :—
(१) जैसे प्लक्ष (पाखर या वरगद) का बीज खाने वाला कबूतर सेमल के पेड़ पर जाकर उद्विग्न होता है उसी प्रकार शत्रु पक्ष का व्यक्ति भी विजिगीषु के लिए भयप्रद और बाद में उद्वेगजनक होता है ।
(२) किसी देश या समय को निश्चित करके जो युद्ध-घोषणा की जाती है उसे प्रकाशयुद्ध कहते हैं । थोड़ी सी सेना को बहुत दिखाकर भय पैदा कर देना; किलों जलाना एवं लूट-पाट कर देना, प्रमाद तथा व्यसन के समय शत्रु को पीड़ित करना एक स्थान का युद्ध छोड़कर दूसरी ओर से धावा बोल देना—यह कूटयुद्ध है । विष और औषधि आदि के प्रयोगों तथा गुप्तचरों के उपजाप (धोखा-बहकाना) आदि के प्रयोगों से शत्रु का विनाश करना तूष्णींयुद्ध कहलाता है ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में छठा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—