कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ११२ | ## द्वैधीभाविकाः सन्धिविक्रमाश्च |
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| अध्याय ७ |
(१) विजिगीषुद्वितीयां प्रकृतिमेवमुपगृह्णीयात् । सामन्तं सामन्तेन सम्भूय यायात् । यदि वा मन्येत—'पाष्णि मे न ग्रहीष्यति, पाष्णिग्राहं वारयिष्यति, यातव्यं नाभिसरिष्यति, बलद्वैगुण्यं मे भविष्यति, वीवधासारौ मे प्रवर्तयिष्यति, परस्य वारयिष्यति, बह्वाबाधे मे पथि कण्टकान् मर्दयिष्यति, दुर्गाटव्यपसारेषु दण्डेन चरिष्यति, यातव्यमविषह्ये दोषे सन्धौ वा स्थापयिष्यति, लब्धलाभांशो वा शत्रूनन्यानन्मे विश्वासयिष्यती'ति ।
(२) द्वैधीभूतो वा कोशेन दण्डं दण्डेन कोशं सामन्तानामन्यतमाल्लिप्सेत ।
द्वैधीभाव संबंधी संधि और विक्रम
( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि अपने पड़ोस के शत्रु राजा को वह अपनी सहायता के लिए इन तरीकों से तैयार करे : किसी एक सामंत से मिलकर वह यातव्य सामंत पर चढाई करे । अथवा यदि ऐसा समझे कि 'अपने साथ मिलाया हुआ सामंत, मेरी अनुपस्थिति में, मेरे देश पर आक्रमण तो नहीं करेगा; दूसरे पाष्णिग्राह ( पीछे से आक्रमण करने वाले शत्रु ) को रोकेगा, मेरे यातव्य की ओर जाकर न मिलेगा, इसको साथ लेकर मेरी शक्ति दुगुनी हो जायेगी, अपने देश में उत्पन्न धान्य तथा मेरे मित्र राजा की सेना को मेरी सहायता के लिये आने देगा, उसे न रोकेगा, शत्रुदेश में जाने से इन दोनों को रोकेगा, युद्धकाल में मेरे मार्ग की कठिनाइयों को दूर करेगा, दुर्ग तथा आटवियों पर प्रयाण करने के समय सेना द्वारा मुझे मदद पहुँचाता रहेगा, किसी असह्य अनर्थ या आपत्ति के आ जाने पर यातव्य के साथ मेरी संधि करा देगा, अथवा प्रतिज्ञात अपने लाभांश को मुझसे प्राप्त कर मेरे दूसरे शत्रुओं पर भी मेरा विश्वास जमा देगा' इत्यादि ।
( २ ) यदि सामंत को अपने साथ मिलाने में विजिगीषु को विश्वास न हो तो द्वैधीभाव प्रयोग के द्वारा वह पीछे या बगल में रहने वाले किसी एक सामंत को धन देकर, यदि सेना कम हो तो, सेना ले और यदि धन कम हो तो सेना देकर धन प्राप्त करने का यत्न करे ।