भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ११२ : अ० ७ ] द्वैधीभाव सम्बन्धी सन्धि और विक्रम ४८५

(१) तेषां ज्यायसोऽधिकेनांशेन समात्समेन हीनाद्धीनेनेति समसन्धिः । विपर्यये विषमसन्धिः । तयोर्विशेषलाभादतिसन्धिः । (२) व्यसनिनमपायस्थाने सक्तमनर्थिनं वा ज्यायांसं हीनो बलसमेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत । अन्यथा सन्दध्यात् । (३) एवंभूतो हीनशक्तिप्रतापपूरणार्थं संभाव्यार्थाभिसारी मूलपाष्णि-त्राणार्थं वा ज्यायांसं हीनो बलसमाद्विशिष्टेन लाभेन पणेत । पणितः कल्याणबुद्धिमनुगृह्णीयादन्यथा विक्रमेत । (४) जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रमुपस्थितार्थं वा ज्यायांसं हीनो दुर्गमित्र-प्रतिस्तब्धो वा ह्रस्वमध्वानं यातुकामः शत्रुमयुद्धमेकान्तसिद्धिं लाभमादातु-


( १ ) विषमसंधि के तीन प्रकार हैं : १. अधिक शक्तिशाली सामंत को अधिक लाभांश देकर उससे संधि करना, २. समान शक्तिशाली सामंत को समभाग लाभांश देकर उससे संधि करना और ३. कम शक्तिशाली सामंत को थोड़ा हिस्सा लाभांश देकर उससे संधि करना । इसके विपरीत विषमसंधि के छह प्रकार हैं : १. अधिक शक्तिशाली सामंत को बराबर हिस्सा देकर या २. कम हिस्सा देकर ३. समान शक्ति-शाली सामंत को कम हिस्सा देकर या ४. अधिक हिस्सा देकर तथा ५. हीनशक्ति सामंत को बराबर हिस्सा देकर या ६. अधिक हिस्सा देकर । ये दोनों प्रकार की संधियों के द्वारा जब प्रतिज्ञात धन से अधिक धन का लाभ हो जाय तो वे अतिसंधि कहलाती हैं; अर्थात् इस अतिसंधि भेद से वे ( ३ सम + ६ विषम ) नौ संधियाँ अठारह प्रकार की हो जाती हैं ।

( २ ) हीनशक्ति विजिगीषु को चाहिए कि वह व्यसनी, शारीरिक नाश करने में निरत और अनर्थकारी, अधिक शक्ति सामंत के साथ, सेना के समान हिस्सा लेकर ही सन्धि करे । इस प्रकार सन्धि करने पर यदि अधिक शक्ति सामंत, अपना तिरस्कार करने वाले विजिगीषु का अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे, अन्यथा शान्त रहे ।

( ३ ) समसंधि : इस प्रकार व्यसनपीडित हीनशक्ति विजिगीषु को चाहिए कि अपने विनष्ट प्रताप एवं शक्ति को पूरा करने के लिए और अपने सम्भावित अर्थ को पूरा करने के लिए अथ च अपने दुर्ग तथा र्पाष्ण की रक्षा करने के लिए सेना की अपेक्षा अधिक हिस्सा देकर अधिक शक्ति संपन्न सामन्त के साथ, वह सन्धि कर ले । सन्धि कर लेने पर यदि हीनशक्ति विजिगीषु ईमानदारी से रहे तो अधिक शक्ति सामन्त सदा उस पर अनुग्रह बनाये रखे । अन्यथा उस पर आकमण कर दे ।

( ४ ) शिकार आदि व्यसनों में आसक्त, कुपित, लोभी तथा भीरु अमात्य, अमात्य-प्रकृतिवाले अनर्थकारी अधिकशक्ति सामंत के साथ, हीनशक्ति विजिगीषु, अपने मजबूत किलों एवं सहायक मित्रों के कारण गर्वित, अथवा अपने नजदीक के किसी शत्रु