भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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४८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

कामो बलसमाद्धीनेन लाभेन पणेत। पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत। अन्यथा सन्दध्यात्।

(१) अरन्ध्रव्यसनो वा ज्यायान् दुरारब्धकर्माणं भूयः क्षयव्ययाभ्यां योक्तुकामो दूष्यदण्डं प्रवासयितुकामो दूष्यदण्डमावाहयितुकामो वा पीडनीयमुच्छेदनीयं वा हीनेन व्यथयितुकामः सन्धिप्रधानो वा कल्याणबुद्धिः हीनं लाभं प्रतिगृह्णीयात्। कल्याणबुद्धिना सम्भूयार्थं लिप्सैत। अन्यथा विक्रमेत।

(२) एवं समः सममतिसन्दध्यादनुगृह्णीयाद्वा।

(३) परानीकस्य प्रत्यनीकं मित्राटवीनां वा शत्रोर्विभूमीनां देशिकं मूलपाष्णिंत्राणार्थं वा समः समबलेन लाभेन पणेत। पणितः कल्याणबुद्धिमनुगृह्णीयादन्यथा विक्रमेत।

(४) जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रमनेकविरुद्धमन्यतो लभमानो वा समः सम-


पर आक्रमण करने वाला बिना लाभ के ही विजय की इच्छा रखने वाला, सेना की अपेक्षा थोड़ा हिस्सा देकर ही सन्धि कर ले। यदि अधिकशक्ति सामंत, अपना तिरस्कार करने वाले हीनशक्ति राजा का इस प्रकार की संधि कर लेने पर अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे। अन्यथा सन्धि बनाये रखे।

(१) प्रकृतिकोप एवं मृगयादि व्यसनों से पृथक् हुए अपने विरोधी शत्रु को अधिक क्षय-व्यय से ग्रस्त रखने की इच्छा करने वाला, अपनी दूषित सेना को निकालने तथा शत्रु की दूषित सेना को अपने यहाँ बुलाने की इच्छा करने वाला, या पीड़ित एवं विनष्ट करने योग्य शत्रु का हीन शक्ति राजा से पीड़न तथा उच्छेदन कराने की इच्छा रखने वाला, अथवा सन्धि गुण को प्रमुख समझने वाला कल्याणबुद्धि अधिकशक्ति सामंत होने के कारण थोड़े दिये हुए लाभ को भी स्वीकार कर ले। कल्याणबुद्धि हीन के साथ मिलकर बराबर उसकी सहायता करता रहे। यदि वह हीन दुष्टबुद्धि हो तो उस पर आक्रमण कर दे।

(२) इसी प्रकार समशक्ति सामंत, दूसरे समशक्ति सामंत के साथ दुष्टबुद्धि और कल्याणबुद्धि देखकर ही निग्रह तथा अनुग्रह करे।

(३) शत्रु की सेना के साथ तथा शत्रु के मित्र एवं आटविकों के साथ युद्ध करने में समर्थ, शत्रु के पर्वतीय प्रांतों का नक्शा भलीभाँति समझने वाला, अथवा अपने दुर्ग तथा पाष्णि की रक्षा करने के लिए सम सामंत की सेना बराबर विजय-लाभांश देकर सन्धि कर ले। सन्धि करने पर यदि समशक्ति सामंत कल्याणबुद्धि बना रहे तो उस पर अनुग्रह बनाये रखे, अन्यथा उस पर आक्रमण कर दे।

(४) मृगया आदि व्यसनों तथा प्राकृतिककोपों से पीड़ित और दूसरे अनेक सामंतों का विरोधी अथवा सहायता बिना ही अन्य उपायों से हुई कार्यसिद्धि, सम-