भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ११२ : अ० ७ ] द्वैधीभाव सम्बन्धी सन्धि और विक्रम ४८७

बलाद्धीनेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत, अन्यथा सन्दध्यात् ।

(१) एवंभूतो वा समः सामन्तायत्तकार्यः कर्तव्यबलो वा बलसमाद्विशिष्टेन लाभेन पणेत । पणितः कल्याणबुद्धिमनुगृह्णीयादन्यथा विक्रमेत ।

(२) जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रमभिहन्तुकामः स्वारब्धमेकान्तसिद्धिं वास्य कर्मोपहन्तुकामो मूले यात्रायां वा प्रहर्तुकामो यातव्याद् भूयो लभमानो वा ज्यायांसं हीनं समं वा भूयो याचेत । भूयो वा याचितः स्वबलरक्षार्थं दुर्धर्षमन्यदुर्गमासारमटवीं वा परदण्डेन मर्दितुकामः प्रकृष्टेऽध्वनि काले वा परदण्डं क्षयव्ययाभ्यां योक्तुकामः परदण्डेन वा विवृद्धस्तमेवोच्छेत्तुकामः परदण्डमादातुकामो वा भूयो दद्यात् ।


शक्ति सामंत के साथ सेना की अपेक्षा थोड़ा ही लाभांश देकर सन्धि कर ले । सन्धि करने के बाद यदि वह उसका उपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे अन्यथा चुपचाप सन्धि कर ले ।

( १ ) मृगयादि व्यसनों और प्रकृति-कोपों से पीड़ित, दूसरे सामंत की सहायता करने पर ही अपने कार्यों की सफलता देखने वाला अथवा नई सेना भर्ती करने वाला समशक्ति सामंत, दूसरे समशक्ति सामंत के साथ सेना की अपेक्षा अधिक लाभ देकर सन्धि कर ले । सन्धि करने पर यदि वह कल्याणबुद्धि बना रहे तो उस पर सदा अनुग्रह बनाये रखे, अन्यथा आक्रमण कर दे ।

( २ ) मृगयादि व्यसनों एवं प्रकृति-प्रकोपों से पीड़ित अधिकशक्तिसंपन्न ( ज्याय ) हीनशक्ति अथवा समशक्ति सामंत को नष्ट करने की इच्छा करने वाला या उचित देश-काल के अनुसार आरंभित उसके अवश्यंभावी कार्यों को नष्ट करने की इच्छा रखने वाला अथवा विजिगीषु की यात्रा के बाद उसके पीछे से उसके किले आदि पर चढ़ाई करने की कामना वाला, अथवा विजिगीषु की अपेक्षा यातव्य से अधिक धन पा जाने वाला हीन, ज्याय या समशक्ति सामंत, उक्त ज्याय, हीन या समशक्ति सामंत से अधिक लाभ की माँग करे । इस प्रकार माँग करने पर अपनी सेना की रक्षा के लिए तथा दूसरे के दुर्गम दुर्ग, मित्रबल, आटविकों आदि को दूसरे सामंत की सेना से कुचल डालने की इच्छा रखने वाला, दूर देश में अधिक समय तक दूसरे सामंत की सेना को काम पर लगा क्षय-व्यय से युक्त करने की इच्छा रखने वाला, या यातव्य की सेना के द्वारा अपनी सेना को बढाकर फिर उस अधिक माँगने वाले का उच्छेदन करने की कामना वाला अथवा यातव्य की सेना को उस अधिक माँगने वाले सामंत की सहायता से लेने की इच्छा रखने वाला, अवश्यमेव उतना अधिक लाभ दे, जितने की दूसरे सामंत माँग करें ।