कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४८८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ सातवाँ अधिकरण |
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(१) ज्यायान् वा हीनं यातव्यापदेशेन हस्ते कर्तुकामः परमुच्छिद्य वा तमेवोच्छेत्तुकामः त्यागं वा कृत्वा प्रत्यादातुकामो बलस्माद्विशिष्टेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत, अन्यथा सन्दध्यात् । यातव्य-संहितो वा तिष्ठेत् । दूष्यामित्राटवीदण्डं वास्मै दद्यात् ।
(२) जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रो वा ज्यायान् हीनं बलसमेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत, अन्यथा सन्दध्यात् ।
(३) एवंभूतं वा हीनं ज्यायान् बलस्माद्धीनेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत, अन्यथा सन्दध्यात् ।
(४) आदौ बुद्धयेत पणितः पणमानश्च कारणम् । ततो वितर्क्योभयतो यतः श्रेयस्ततो व्रजेत् ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे द्वैधीभावसन्धिविक्रमोनाम सप्तमोऽध्याय, आदितश्चतुश्शततमः ।
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(१) यातव्य के बहाने अपने वश में करने की इच्छा रखने वाला, शत्रु का उच्छेद कर फिर उसी का उच्छेद करने की कामना वाला, या देकर फिर लौटा लाने की इच्छा रखने वाला अधिकशक्ति सामंत हीनशक्ति सामंत के साथ, अवश्यमेव सेना की अपेक्षा अधिक लाभ देकर, संधि कर ले । संधि हो जाने पर यदि वह उसका अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे, अन्यथा चुपचाप संधि बनाये रखे । अथवा यातव्य के साथ संधि करके पूर्ववत् बना रहे । अथवा अपनी शत्रु सेना तथा आटविक सेना को संधि करने वाले अधिक शक्ति सामंत को दे दे ।
(२) व्यसन पीडित एवं आपत्तिग्रस्त अधिक शक्ति सामंत के साथ, सेना के बराबर लाभ देकर, संधि कर ले । संधि करने के बाद यदि वह उसका अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे, अन्यथा संधि को पूर्ववत् बनाये रखे ।
(३) अधिक शक्ति सामंत को चाहिए कि व्यसनी एवं विपत्तिग्रस्त हीनशक्ति सामंत के साथ वह सेना की अपेक्षा कम लाभ देकर संधि कर ले । यदि वह अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे, अन्यथा पूर्ववत् संधि बनाये रखे ।
(४) विजयेच्छु पणित (जिससे संधि की जाय) और पणमान (संधि करने वाला) दोनों को चाहिए कि वे ऊपर बताई गई संधियों के कारणों को भलीभांति समझ लें । उसके बाद संधि तथा विग्रह करने पर लाभ तथा हानि के परिणामों को समझ-बूझ कर जिसमें अपना कल्याण समझें उस मार्ग को अपनाये ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में सातवाँ अध्याय समाप्त ।
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