भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 580
४९६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवाँ अधिकरण

(१) हिरण्यभोगं भूमिभोगं वा मित्रमिति । 'हिरण्यभोगं गतिमत्त्वात्सर्वव्ययप्रतीकारकरम्' इत्याचार्याः ।

(२) नेति कौटिल्यः—'मित्रहिरण्ये हि भूमिलाभाद्भवतः' इत्युक्तं पुरस्तात् । तस्माद्भूमिभोगं मित्रं श्रेय इति ।

(३) तुल्ये पुरुषभोगे विक्रमः क्लेशसहत्वमनुरागः सर्वबललाभी वा मित्रकुलाद्विशेषः ।

(४) तुल्ये हिरण्यभोगे प्रार्थितार्थता प्राभूत्यमल्पप्रयासता सातत्यं च विशेषः ।

(५) तत्रैतद्भवति—

नित्यं वश्यं लघूत्थानं पितृपैतामहं महत् ।
अद्वैध्यं चेति सम्पन्नं मित्रं षड्गुणमुच्यते ॥

(६)

ऋते यदर्थं प्रणयाद्रक्ष्यते यच्च रक्षति ।
पूर्वोपचितसम्बन्धं तन्मित्रं नित्यमुच्यते ॥

(७)

सर्वचित्रमहाभोगं त्रिविधं वश्यमुच्यते ।


(१) 'हिरण्य देने वाला मित्र श्रेष्ठ है या भूमि देने वाला मित्र श्रेष्ठ है ?' इस पर पूर्वाचार्यों का कहना है कि हिरण्य देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है; क्योंकि धन को जहाँ चाहो, इच्छानुसार लगाया जा सकता है और हर तरह का व्यय उससे पूरा किया जा सकता है ।

(२) किन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'मित्र और हिरण्य दोनों ही भूमि से प्राप्त किए जा सकते हैं' इस बात को पहिले ही बताया जा चुका है । इसलिए भूमि की सहायता देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है ।

(३) यदि दो मित्र समान रूप से पुरुषों की सहायता पहुँचाने वाले हों तो उनमें जो पराक्रमी, क्लेशसह; अनुरागी और मौलभृत आदि सभी प्रकार की सेनाएँ देने वाला हो वही श्रेष्ठ है ।

(४) इसी प्रकार समानरूप से हिरण्य आदि की सहायता पहुँचाने वाले दो मित्रों में वही मित्र श्रेष्ठ है; जो थोड़ा ही कहने पर बहुत धन दे और निरंतर ही ऐसा देता रहे ।

(५) मित्र और उनके गुण : गुण भेद से मित्र छह प्रकार के होते हैं; नित्य, वश्य, लघूत्थान, पितृ-पैतामह, महत् और अद्वैध्य ।

(६) निस्वार्थ भाव से पुराने संबंधों के कारण स्नेहवश विजिगीषु जिसकी रक्षा करता है और जो विजिगीषु की रक्षा करता है उसको नित्यमित्र कहते हैं ।

(७) वश्यमित्र तीन प्रकार का होता है : सर्वभोग, चित्रभोग और महाभोग ।