भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 579

प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि-विचार ( १) ४९५

(१) विक्षिप्तसैन्यमवश्यसैन्यं वेति ? 'विक्षिप्तं सैन्यं शक्यं प्रतिसंहर्तुं वश्यत्वात्' इत्याचार्याः। (२) नेति कौटिल्यः। अवश्यसैन्यं श्रेयः। अवश्यं हि शक्यं सामादिभिर्वश्यं कर्तुं, नेतरत्कार्यव्यासक्तं प्रतिसंहर्तुम्। (३) पुरुषभोगं हिरण्यभोगं वा मित्रमिति। 'पुरुषभोगं मित्रं श्रेयः, पुरुषभोगं मित्रं प्रतापकरं भवति। यदा चोत्तिष्ठते तदा कार्यं साधयति' इत्याचार्याः। (४) नेति कौटिल्यः। हिरण्यभोगं मित्रं श्रेयः, नित्यो हिरण्येन योगः कदाचित् दण्डेन दण्डश्च हिरण्येनान्ये च कामाः प्राप्यन्त इति।


से शीघ्र तैयार हो जाने वाला निर्बल मित्र ही उत्तम है, क्योंकि ऐसा मित्र हरेक आवश्यकता पर काम आता है और इच्छानुसार उसको किसी भी कार्य में लगाया जा सकता है। इसके विपरीत ये सभी बातें दूसरे मित्र में नहीं होतीं, विशेषतया जब कि वह दूर देश में रहता है।

( १ ) 'कार्य सिद्धि के लिए अनेक स्थानों में विघटित राजा की वश्य सेना अच्छी है या जिसकी सेना तो अपने वश में न हो लेकिन सब अपने पास हो, ऐसा मित्र अच्छा है ?' पूर्वाचार्यों का इस संबंध में यह सुझाव है कि विघटित सेना शीघ्र ही एकत्र की जा सकती है।

( २ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि अपने पास ही एकत्र अवश्य सेना वाला राजा ही मित्र के लायक है; क्योंकि साम, दाम आदि उपायों से उस सेना को अपने वश में किया जा सकता है और शीघ्र ही इच्छित कार्यों में उसको लगाया जा सकता है। इसके विपरीत दूसरे कार्यों में व्यस्त बिखरी हुई सेना को तत्काल एकत्र कर अपने कार्यों में नहीं लगाया जा सकता है।

( ३ ) 'आदमियों की सहायता देने वाला मित्र अच्छा है ? या हिरण्य की सहायता देने वाला मित्र अच्छा है ? इन दोनों में आदमियों की सहायता देने मित्र ही अच्छा है, क्योंकि वह स्वयं ही शत्रुओं पर आक्रमण कर उन्हें दबा सकता है, और जब कभी भी कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है तो उस कार्य को पूरा भी कर डालता है ऐसा पूर्वाचार्यों का मत है।

( ४ ) किन्तु कौटिल्य इस बात को नहीं मानता है। उसके मत से हिरण्य आदि की सहायता देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है, क्योंकि धन की आवश्यकता सदा ही बनी रहती है, जब कि सेना की आवश्यकता कभी-कभी ही होती है। और फिर धन के के द्वारा सेना-संग्रह भी किया जा सकता है तथा दूसरे अभीष्ट कार्यों को भी पूरा किया जा सकता है।