कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) नेति कौटिल्यः-वश्यमनित्यं श्रेयः, यावदुपकरोति तावन्मित्रं भवति । उपकारलक्षणं मित्रमिति ।
(२) वश्ययोरपि महाभोगमनित्यमल्पभोगं वा नित्यमिति । 'महाभोग-मनित्यं श्रेयः, महाभोगमनित्यमल्पकालेन महदुपकुर्वन्महान्ति व्ययस्थानानि प्रतिकरोति' इत्याचार्याः ।
(३) नेति कौटिल्यः । नित्यमल्पभोगं श्रेयः, महाभोगमनित्यमुपकार-भयादपक्रामति, उपकृत्य वा प्रत्यादातुमीहते । नित्यमल्पभोगं सातत्यादल्प-मुपकुर्वन्महता कालेन महदुपकरोति ।
(४) गुरुसमुत्थं महान्मित्रं लघुसमुत्थमल्पं वेति । 'गुरुसमुत्थं महान्मित्रं प्रतापकरं भवति, यदा चोत्तिष्ठते, तदा कार्यं साधयति' इत्याचार्याः ।
(५) नेति कौटिल्यः-लघुसमुत्थमल्पं श्रेयः, लघुसमुत्थमल्पं मित्रं कार्यकालं नातिपातयति दौर्बल्याच्च यथेष्टभोग्यं भवति, नेतरत् प्रकृष्ट-भौमम् ।
(१) परन्तु कौटिल्य का कहना है कि अपने वश में रहने वाला अनित्य मित्र का प्राप्त होना ही श्रेष्ठ है, क्योंकि जब तक वह उपकार करता रहता है तभी तक मित्र बना रहता है, मित्र का लक्षण ही अपने साथी की भलाई करना है ।
(२) 'अपने वश में रहने वाले दो मित्रों में से थोड़े समय के लिए अधिक कर देने वाला मित्र अच्छा है या हमेशा थोड़ा-थोड़ा कर देने वाला मित्र अच्छा है ?' पूर्वाचार्यों का कहना है कि थोड़े दिन तक अधिक कर देने वाला मित्र श्रेष्ठ है, क्योंकि वह थोड़े ही समय में बहुत ज्यादा धनादि देकर विजिगीषु का महान् उपकार कर देता है, तथा अपनी सहायता से राजकीय व्ययछिद्रों का भी प्रतीकार कर देता है ।
(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि सदा के लिए थोड़ा-थोड़ा देने वाला मित्र श्रेष्ठ है, क्योंकि एक साथ अधिक देने के भय से मित्रता भी टूट जाती है और फिर वह अपने दिये गये धन को वापिस करने के लिए यत्न करता है । इसके विपरीत थोड़ा-थोड़ा धन देने वाला मित्र विजिगीषु का बड़ा उपकार करता है ।
(४) बड़ी कठिनाई और बड़े यत्न करने पर शत्रु से युद्ध करने के लिए तैयार होने वाला प्रबल मित्र अच्छा है या सरलता से शीघ्र ही तैयार हो जाने वाला निर्बल मित्र श्रेष्ठ है ?' इस पर पूर्वाचार्यों का कहना है कि कठिनता से तैयार होने वाला प्रबल मित्र ही अच्छा है, क्योंकि एक तो वह शत्रुओं का दमन कर सकेगा और दूसरे में कार्य को भी पूरा कर देगा ।
(५) किन्तु कौटिल्य इस तर्क से सहमत नहीं है । उसका कहना है कि सरलता