कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 577, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ११५ | मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धयः |
|---|---|
| अध्याय ९ |
(१) संहितप्रयाणे मित्रहिरण्यभूमिलाभानामुत्तरोत्तरो लाभः श्रेयान् । मित्रहिरण्ये हि भूमिलाभाद्भवतः, मित्रं हिरण्यलाभात् । यो वा लाभः सिद्धः शेषयोरन्यतरं साधयति । (२) 'त्वं चाहं च मित्रं लभावहे' इत्येवमादिः समसन्धिः । 'त्वं मित्रम्' इत्येवमादिर्विषमसन्धिः । तयोर्विशेषलाभादतिसन्धिः । (३) समसन्धौ तु यः सम्पन्नं मित्रं मित्रकृच्छ्रे वा मित्रमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । आपद्धि सौहृदस्थैर्यमुत्पादयति । (४) मित्रकृच्छ्रेऽपि नित्यमवश्यमनित्यं वश्यं वेति । 'नित्यमवश्यं श्रेयः, तद्ध्यनुपकुर्वदपि नापकरोति' इत्याचार्याः ।
मित्रसंधि और हिरण्यसंधि
( संधि-विचार १ )
(१) संयुक्त युद्ध-यात्रा में मित्र, हिरण्य और भूमि, इन लाभों में उत्तरोत्तर लाभ श्रेष्ठ है । क्योंकि भूमिलाभ से शेष दोनों लाभ प्राप्त हो सकते हैं और हिरण्य लाभ से मित्रलाभ सुलभ किया जा सकता है । अथवा जिस प्राप्त हुए लाभ से शेष दोनों या उनमें से कोई एक लाभ सिद्ध हो सके, वही श्रेष्ठ समझना चाहिए ।
(२) 'तुम और हम, दोनों मिलकर मित्र को लाभ पहुँचायें' इस प्रकार की गई संधि को समसंधि कहते हैं । 'तुम मित्र-लाभ प्राप्त करो और मैं हिरण्य का अथवा तुम हिरण्य का लाभ प्राप्त करो और मैं भूमि का' इस प्रकार की गई संधि को विषमसंधि कहते हैं । इन दोनों संधियों में पूर्व लिखित लाभ से अधिक लाभ प्राप्त हो तो वह अतिसंधि कहलाती है ।
(३) समसंधि में जो संपन्न मित्र को या विपत्तिग्रस्त मित्र को प्राप्त करता है, वह अतिसंधि के विशेष लाभ को प्राप्त करता है । क्योंकि आपत्ति में मित्रता और भी दृढ़ हो जाती है ।
(४) मित्र के विपत्तिकाल में, अपने वश में न रहने वाले नित्य मित्र का मिलना उत्तम है या अपने वश में रहने वाले अनित्य मित्र का मिलना अच्छा है ? इस संबंध में पुरातन आचार्यों का कहना है कि नित्य मित्र का प्राप्त करना ही श्रेष्ठ है, क्योंकि वह उपकार न करे किन्तु अपकार कभी भी नहीं करता है ।