कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 576, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें४९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
(१) यं तु मन्येत—'कृतार्थो मे दण्डं गृह्णीयादमित्राटव्यभूम्यनृतुषु वा वासयेदफलं वा कुर्यादि'ति दण्डव्यासङ्गापदेशेन नैनमनुगृह्णीयात् । एवमवश्यं त्वनुग्रहीतव्ये तत्कालसहमस्मै दण्डं दद्यात् । आ समाप्तैश्चैनं वासयेद्योधयेच्च, बलव्यसनेभ्यश्च रक्षेत् । कृतार्थच्च सापदेशमवस्त्रावयेत् । दूष्यामित्राटवीदण्डं वास्मै दद्यात् । यातव्येन वा सन्धायैनमतिसन्दध्यात् ।
(२) समे हि लाभे सन्धिः स्याद्विषमे विक्रमो मतः ।
समहीनविशिष्टानामित्युक्ताः सन्धिविक्रमाः ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे यातव्यवृत्तिरग्राह्यमित्रविशेषो नाम अष्टमोऽध्याय; आदितः पञ्चशततमः ।
— : ० : —
गई हो उसकी पूर्ति के लिए तथा दूसरे कार्यों की सफलता के लिए ऐसे अवसर पर मौलबल, भृतबल, श्रेणीबल, मित्रबल और आटवीबल, इन पाँचों में से किसी एक सेना को उचित देश-काल के अनुसार भेज देना चाहिए । अथवा दूर देश और अधिक समय के लिए अमित्रबल या आटवीबल को ही भेजना चाहिए ।
( १ ) जिस उदासीन या मध्यम को यह समझा जाय कि : वह अपना कार्य निकाल लेने के बाद मेरी सेना को अपने वश में कर लेगा, या उसको शत्रु के पास, आटविक के पास, अयुक्त स्थानों तथा ऋतुओं में रखेगा, अथवा मेरी सेना को जीत का कोई हिस्सा न देगा' उसको कुछ बहाना बना कर सेना न दी जाय । यदि इस प्रकार के राजा की सहायता करनी परमावश्यक हो तो उतने समय तक के लिए उसको समर्थ सैनिक दिये जायें, जब तक कार्य समाप्त न हो और सुविधाजनक भूमि में सेना रहे तथा अवसर आने पर ही वह युद्ध करे, साथ ही सैनिक आपत्तियों या निरस्त्र हो जाने की स्थिति से उन्हें सुरक्षित रखे । कार्य हो जाने के बाद कुछ बहाना बनाकर सेना वापिस बुला ली जाय । फिर जरूरत पड़ने पर अपनो दूष्यसेना, शत्रु सेना या आटविक सेना को ही देना चाहिए, अथवा यातव्य के साथ मिलकर मध्यम या उदासीन राजा से खूब धन वसूल करे ।
( २ ) बराबर लाभ देने पर सन्धि और लाभांश में ज्यादा-कमी करने पर विग्रह कर देना चाहिए । इस अध्याय में सम, हीन और विशिष्ट राजाओं की सन्धि तथा विक्रम का निरूपण किया गया ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में यातव्यवृत्ति-अनुग्राह्यमित्रविशेष नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।
— : ० : —