भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 575

प्र० ११३-११४ : अ० ८ ] [ यातव्य-अनुग्राह्य सम्बन्धी व्यवहार ४९१

(१) तयोरेकपुरुषानुग्रहे यो मित्रं मित्रतरं वानुगृह्णाति सोऽतिसन्धत्ते । मित्रादात्मवृद्धिं हि प्राप्नोति । क्षयव्ययप्रवासपरोपकारान् इतरः । कृतार्थश्च शत्रुर्वैगुण्यमेति ।

(२) मध्यमं त्वनुगृह्णतोर्यो मध्यमं मित्रं मित्रतरं वानुगृह्णाति सोऽतिसन्धत्ते । मित्रादात्मवृद्धिं हि प्राप्नोति । क्षयव्ययप्रवासपरोपकारानितरः । मध्यमश्चेदनुगृहीतो विगुणः स्यादमित्रोऽतिसन्धत्ते । कृतप्रयासं हि मध्यमामित्रमपसृतमेकार्थोपगतं प्राप्नोति ।

(३) तेनोदासीनानुग्रहो व्याख्यातः ।

(४) मध्यमोदासीनयोर्बलांशदाने यः शूरं कृतास्त्रं दुःखसहमनुरक्तं वा दण्डं ददाति, सोऽतिसन्धीयते । विपरीतोऽतिसन्धत्ते ।

(५) यत्र तु दण्डः प्रतिहतस्तं वा चार्थमन्यांश्च साधयति, तत्र मौलभृतश्रेणीमित्राटवीबलानामन्यतममुपलब्धदेशकालं दण्डं दद्यात् । अमित्राटवीबलं वा व्यवहितदेशकालम् ।


के मित्रों को सहायता देकर कृतार्थ किया जाय तो उनसे विजिगीषु को बहुत सहायता मिलती है । इनसे विपरीत अशक्यारम्भी आदि पर कदापि भी अनुग्रह न किया जाय ।

( १ ) यदि शत्रु और विजिगीषु दोनों एक ही व्यक्ति पर अनुग्रह करना चाहते हों, तो जो मित्र या अतिमित्र हो उस पर ही अनुग्रह किया जाय, क्योंकि वह अत्यन्त लाभ पहुँचाता है । मित्र से तो सर्वदा ही आत्मवृद्धि होती है, यदि उस पर अनुग्रह भी किया जाय तब तो कहना ही क्या है । जो भी मित्र की जगह शत्रु पर अनुग्रह करता है उसके पुरुष एवं धन का नाश होता है तथा दूर-दूर जाकर उसको शत्रु का उपकार करना पड़ता है, और कार्य सध जाने के बाद फिर शत्रु उससे बिगाड़ कर लेता है ।

( २ ) यदि शत्रु और विजिगीषु मध्यम राजा पर अनुग्रह करना चाहें तब भी मित्र अथवा अतिमित्र पर ही अनुग्रह करना ठीक होता है, क्योंकि मित्र से सदा ही अपनी संवृद्धि होती है और शत्रु पर अनुग्रह करने वाले को सदा ही क्षय, व्यय, प्रवास सहना पड़ता है तथा शत्रु का उपकार करना पड़ता है अनुगृहीत मध्यम राजा के बिगड़ जाने पर अपने शत्रु को ही विशेष लाभ होता है, क्योंकि मित्र बनकर बिगड़ जाने के बाद शत्रु बना मध्यम समान कार्य करने वाले विजिगीषु के शत्रु को अपना मित्र बना लेता है ।

( ३ ) इसी प्रकार उदासीन राजा पर अनुग्रह करने का सुफल कुफल समझ लेना चाहिए ।

( ४ ) मध्यम और उदासीन राजाओं को सेना की सहायता में जो अपने शस्त्र-सञ्चालन में कुशल, दुःखसहिष्णु एवं अनुरक्त सैनिक को दे डालते हैं वे धोखा खाते हैं, और जो ऐसा नहीं करता वह लाभ में रहता है ।

( ५ ) जिस कार्य को सम्पन्न करने के लिए एक बार भेजी हुई सेना नष्ट हो