कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ सातवां अधिकरण
(१) दूष्यामित्राभ्यां मूलहरेण वा ज्यायसा विगृहीतं त्रातुकामस्तथा-विधमुपकारं कारयितुकामः सम्बन्धापेक्षी वा तदात्वे च आयत्यां लाभं न प्रतिगृह्णीयात् । (२) कृतसन्धिरतिक्रमितुकामः परस्य प्रकृतिकर्शनं मित्रामित्रसन्धि-विश्लेषणं वा कर्तुकामः पराभियोगाच्छङ्कमानो लाभमप्राप्तमधिकं याचेत । तमितरस्तदात्वे च आयत्यां च क्रममवेक्षेत । तेन पूर्वे व्याख्याताः । (३) अरिविजिगीष्वोस्तु स्वं स्वं मित्रमनुगृह्णतोः शक्यकल्यभव्या-रम्भिस्थिरकर्मानुरक्तप्रकृतिभ्यो विशेषः । शक्यारम्भी विषह्यं कर्मारभेत् । कल्यारम्भी निर्दोषम् । भव्यारम्भी कल्याणोदयम् । स्थिरकर्मा नासमाप्य कर्मोपरमते । अनुरक्तप्रकृतिः सुसहायत्वादल्पेनाप्यनुग्रहेण कार्यं साधयति । त एते कृतार्थाः सुखेन प्रभूतं चोपकुर्वन्ति । अतः प्रतिलोमेनानुग्राह्याः ।
शत्रुओं को वह हानि कर पायेगा; पुराने सहायक पुनः सहायता करेंगे; ऐसी स्थिति में उस समय अधिक लाभ को छोड़ कर भविष्य में भी वह थोड़े ही लाभ की कामना करे ।
( १ ) यदि वह चाहता हो कि दूष्य, शत्रु एवं अधिकशक्ति सामन्त से उसके साथी सामन्त की रक्षा हो जाय अथवा अपने प्रति भी इसी प्रकार के उपकारों को चाहे; और यह चाहे कि यातव्य के साथ उसका सम्बन्ध जुड़ जाय, तो उस समय और भविष्य में भी अपने साथी से कुछ भी लाभ न ले ।
( २ ) यदि वह पहिले की गई सन्धि को तोड़ना चाहे या शत्रुप्रकृति को नष्ट करना चाहे या मित्र तथा शत्रु की सन्धि को तोड़ना चाहे या उसे शत्रु के आक्रमण की आशंका हो या अप्राप्त पूर्व निश्चित लाभ से अधिक लाभांश की माँग करे, ऐसी दशा में दूसरे सामन्त को चाहिए, जिससे लाभ की माँग की गई है, कि वह इस प्रकार की माँग के सम्बन्ध में उस समय और भविष्य में होने वाले लाभ तथा हानि का भलीभाँति विचार करे । इसी प्रकार पूर्वोक्त तीन पक्षों में भी हानि-लाभ का विचार समझना चाहिए ।
( ३ ) अपने-अपने मित्रों पर बड़ा अनुग्रह रखने वाले शत्रु और विजिगीषु, दोनों को चाहिए कि वे १. शक्यारम्भी २. कल्याणारम्भी ३. भव्यारम्भी ४. स्थिर-कर्मा और ५. अनुरक्त प्रकृति, इन पाँच प्रकार के मित्रों पर विशेष अनुग्रह रखें । अपनी शक्ति के अनुसार कर सकने योग्य कार्य को ही आरम्भ करने वाला शक्या-रम्भी कहलाता है । दोष रहित कार्य को आरम्भ करने वाला कल्याणारम्भी कहलाता है । भविष्य में कल्याणप्रद फल को देने वाले को जो आरम्भ करे उसे भव्यारम्भी कहते हैं । आरम्भ किये हुए कार्य को जो समाप्त किये बिना न छोड़े उसे स्थिरकर्मा कहते हैं । अच्छे सहायक मिल जाने के कारण थोड़ी-सी सेना आदि से कार्य को पूरा कर देने वाला अनुरक्तप्रकृति कहलाता है । यदि इन पाँच प्रकार