कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ११६ : अ० ११ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५०९
(१) 'यत्किंचिदारभमाणो हि विजिगीषोः कदाचिच्छिद्रमासादयेत्' इत्याचार्याः। (२) 'यथा छिद्रं तथा विनाशमप्यासादयेत्' इति कौटिल्यः । (३) तेषामलाभे यथा पाष्णिग्राहोपग्रहे वक्ष्यामस्तथा भूमिमवस्थाप- येत् । इत्यभिहितसन्धिः । (४) गुणवतीमादेयां वा भूमिं बलवता क्रयेण याचितः सन्धिमवस्थाप्य दद्यात् । इत्यनिभृतसन्धिः । (५) समेन वा याचितः कारणमवेक्ष्य दद्यात् । 'प्रत्यादेया मे भूमि- र्वश्या वा, अनया प्रतिबद्धः परो मे वश्यो भविष्यति, भूमिविक्रयाद्वा मित्र- हिरण्यलाभः कार्यसामर्थ्यकरो मे भविष्यति' इति ।
ऊपर कहे गए सभी राजाओं की अपेक्षा विजिगीषु के लिए वह बहुत खतरनाक सिद्ध होता है ।
( १ ) पूर्वाचार्यों का कहना है कि किसी कार्य को प्रारंभ करता हुआ शत्रु यदि विजिगीषु के किसी दोष का पता लगा ले तो वह यत्किंचनकारी राजा के द्वारा विजिगीषु को हानि पहुँचा सकता है; क्योंकि विजिगीषु उसे मूर्ख समझ कर उससे पीठ फेरे रहता है ।
( २ ) परन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि वह यत्किंचनकारी विजिगीषु के दोषों को जानने की तरह स्वयं को भी नष्ट कर सकता है; क्योंकि विजिगीषु तो उसके अनेक दोषों से परिचित रहता है ।
( ३ ) यदि इन उपर्युक्त राजाओं में से कोई उस व्यय-क्षयी भूमि को खरीदने के लिए तैयार न हो तो जो तरीका आगे पाष्णिग्राह के साथ सन्धि के लिए बताया जायेगा उसी के अनुसार उस भूमि को बसाने की व्यवस्था करे । इसीका नाम अभिहितसंधि है । अभिहितसन्धि, अर्थात् लेन-देन से विचलित न होकर बराबर बनी रहना ।
( ४ ) गुणवती और अदेय भूमि को यदि बलवान् सामंत खरीदना चाहे तो उससे 'अवसर आने पर आप मेरी सहायता करेंगे' ऐसी सामान्य संधि करके वह भूमि उसके हाथ बेच देनी चाहिए, क्योंकि प्रबल सामंत दुर्बल से अविश्वास करके अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ भी सकता है । इसको अनिभृतसन्धि कहते हैं ।
( ५ ) यदि समानशक्ति राजा उस भूमि को खरीदना चाहे तो नीचे लिखे कारणों पर अच्छी तरह विचार करके वह भूमि उसके हाथ बेच देनी चाहिए । वे कारण हैं : बेच देने पर यह भूमि कालान्तर में मेरे पास आ सकेगी, अथवा बेच देने पर भी मैं इससे लाभ उठाता रहूँगा, अथवा इस भूमि के साथ संबंध बना रहने के कारण दूसरा