कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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५१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
(१) तेन हीनः क्रेता व्याख्यातः । (२) एवं मित्रं हिरण्यं च सजनामजनां च गाम् । लभमानोऽतिसन्धत्ते शास्त्रवित्सामवायिकान् ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणेऽनवसितसन्धिनार्म एकादशोऽध्यायः, आदितोऽष्टशततमः ।
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शत्रु मेरे वश में हो जायेगा, अथवा इसको बेच देने पर मैं मित्र तथा धन-संपति से संपन्न हो जाऊँगा ।'
( १ ) इसी प्रकार हीनशक्ति खरीददार के संबंध में भी समझना चाहिए ।
( २ ) अर्थशास्त्रज्ञ राजा इस प्रकार मित्र, धन, संपत्ति, आवाद और वंजर भूमि को प्राप्त करता हुआ दूसरे राजाओं की अपेक्षा सदा ही विशेष लाभ प्राप्त करता है ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में अनवसितसन्धि नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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