भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण ११६
अध्याय १२# कर्मसन्धि

(१) ‘त्वं चाहं च दुर्गं कारयावहे’ इति कर्मसन्धिः । (२) तयोर्यो दैवकृतमविषह्यमल्पव्ययारम्भं दुर्गं कारयति, सोऽतिसन्धत्ते । (३) तत्रापि स्थलनदीपर्वतदुर्गाणामुत्तरोत्तरं श्रेयः । (४) सेतुबन्धयोरप्याहार्योदकात्सहोदकः श्रेयान् । सहोदकयोरपि प्रभूतवापस्थानः श्रेयान् । (५) द्रव्यवनयोरपि यो महत् सारवद्द्रव्याटवीकं विषयान्ते नदीमातृकं द्रव्यवनं छेदयति, सोऽतिसन्धत्ते । नदीमातृकं हि स्वाजीवमपाश्रयश्चापदि भवति । (६) हस्तिवनयोरपि यो बहुशूरमृगं दुर्बलप्रतिवेशमन्तावक्लेशं विषयान्ते हस्तिवनं बध्नाति, सोऽतिसन्धत्ते ।


कर्मसन्धि

( सन्धि-विचार ४ )

( १ ) ‘आप और मैं मिलकर दुर्ग बनवायें’ इस प्रकार किसी कार्य सम्बन्धी वस्तु का नाम लेकर जो सन्धि की जाती है उसको कर्मसन्धि कहते हैं।

( २ ) इस प्रकार की सन्धि करने वाले विजिगीषु और उसका साथी राजा, दोनों में से वही विशेष लाभ में रहता है जो शत्रुओं से दुर्भेद्य दुर्गम स्थान में अल्प व्यय करके दुर्ग बनवाता है।

( ३ ) ऐसे दुर्गों में भी स्थल में बने दुर्ग की अपेक्षा जल में बना दुर्ग श्रेष्ठ है और उससे भी पर्वतीय प्रदेश में बना हुआ दुर्ग श्रेष्ठ होता है।

( ४ ) सेतुबंधों में वर्षा जल से भरने वाले की अपेक्षा स्वाभाविक अर्थात् नहर आदि के जल से भरने वाला सेतुबंध उत्तम है। उनमें भी वह सेतुबन्ध श्रेष्ठ है जो खेती योग्य पर्याप्त भूमि के निकट हो।

( ५ ) जो राजा अनेक पदार्थों को पैदा करने वाले जंगलों में नदियों से सींचे जाने योग्य फल-फूलों को पैदा करने वाले अपने सीमाप्रान्त के जंगलों को ठीक करता है। वही विशेष लाभ में रहता है। क्योंकि नदियों से सींचे जाने वाले स्थान आजीविका के साधन होने के साथ-साथ विपत्ति काल में आश्रय देने वाले भी होते हैं।

( ६ ) हाथी और मृग के जंगलों में भी जो राजा शक्तिशाली जंगली जानवरों