भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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५१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) तत्रापि 'बहुकुण्ठालपशूरयोरल्पशूरं श्रेयः। शूरेषु हि युद्धम्। अल्पाः शूरा बहूनशूरान् भञ्जन्ति, ते भग्नाः स्वसैन्यावघातिनो भवन्ति' इत्याचार्याः।

(२) नेति कौटिल्यः। कुण्ठा बहवः श्रेयांसः, स्कन्धविनियोगादनेकं कर्म कुर्वाणाः स्वेषामपाश्रया युद्धे, परेषां दुर्धर्षा विभीषणाश्च।

(३) बहुषु हि कुण्ठेषु विनयकर्मणा शक्यं शौर्यमाधातुं, न त्वेवाल्पेषु शूरेषु बहुत्वमिति।

(४) खन्योरपि यः प्रभूतसारामदुर्गमार्गामल्पव्ययारम्भां खनिं खानयति, सोऽतिसन्धत्ते।

(५) तत्रापि 'महासारमल्पसारं वा प्रभूतमिति। महासारमल्पं श्रेयः। वज्रमणिमुक्ताप्रवालहेमरूप्यधातुर्हि प्रभूतमल्पसारमत्यर्थेण ग्रसते' इत्याचार्याः।


से युक्त, दुर्बलों के लिए भी सुखकर और अनेक जाने-आने के मार्गों से युक्त हस्तिवनों को अपने प्रदेश में स्थापित करता है वह विशेष लाभ में रहता है।

(१) उन हाथी के जंगलों में भी अशक्त अधिक संख्यावाले हस्तिवन की अपेक्षा शक्तिशाली थोड़े हाथियों वाले जंगल ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि बलवान् हाथियों के भरोसे ही युद्ध होता है। इसके विपरीत पुरातन आचार्यों का कहना है कि अल्पसंख्यक शूर हाथी बहुसंख्यक कायर हाथियों को भगा देते हैं और वे तितर-वितर हो कर अपनी ही सेना को कुचल डालते हैं।

(२) किन्तु कौटिल्य इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कथन है कि शक्तिहीन बहुत हाथियों का होना ही श्रेयस्कर है; क्योंकि सेना के अनेक विभागों में उनसे अनेक कार्य लिए जा सकते हैं। इसलिए युद्ध में वे अच्छे सहायक, शत्रुओं को घबड़ा देने वाले (अधिक होने के कारण) और शत्रु के वश में न आने वाले होते हैं।

(३) संख्या में अधिक हाथी यदि सामर्थ्यहीन भी हों तो कोई हानि नहीं है; क्योंकि युद्ध सम्बन्धी शिक्षाओं के द्वारा उन्हें समर्थ बनाया जा सकता है; किन्तु शक्तिशाली थोड़े हाथियों की संख्या सहसा बढ़ाई नहीं जा सकती है।

(४) खानों में भी, जो राजा उत्तम वस्तुएँ देने वाली, दुर्गम मार्गों से युक्त और अल्प व्ययकर खानों को खुदवाता है वह विशेष लाभ प्राप्त करता है।

(५) उन खानों में भी मणि-माणिक्य आदि बहुमूल्य वस्तुओं को थोड़े परिमाण में उत्पन्न करने वाली खान श्रेष्ठ है? अथवा अधिक परिमाण वाली अल्पमूल्य की वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली खान श्रेष्ठ है? इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का कथन है कि 'बहुमूल्य थोड़ी वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली खान अच्छी है; क्योंकि हीरा,