भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 597

प्र० ११६ : अ० १२ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५१३

(१) नेति कौटिल्यः। चिरादल्पो महासारस्य क्रेता विद्यते। प्रभूतः सातत्यादल्पसारस्य। (२) एतेन वणिकपथो व्याख्यातः। (३) तत्रापि 'वारिस्थलपथयोर्वारिपथः श्रेयान्, अल्पव्ययव्यायामः प्रभूतपण्योदयश्च' इत्याचार्याः। (४) नेति कौटिल्यः। संरुद्धगतिरसार्वकालिकः प्रकृष्टभययोनिर्निष्प्रतिकारश्च वारिपथः। विपरीत: स्थलपथः। (५) वारिपथे तु कूलसंयानपथयोः कूलपथः पण्यपट्टणबाहुल्याच्छ्रेयान्। नदीपथो वा सातत्याद्विषह्याबाधत्वाच्च। (६) स्थलपथेऽपि। 'हैमवतो दक्षिणापथाच्छ्रेयान् हस्त्यश्वगन्धदन्ताजिनरूप्यसुवर्णपण्याः सारवत्तराः' इत्याचार्याः।

मणि, मोती, मूंगा, सोना, चाँदी आदि बहुमूल्य थोड़ी वस्तुएँ, अल्प मूल्य की अधिक वस्तुओं को भी दबा लेती हैं।'

( १ ) किन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य से सहमत नहीं है। वह कहता है कि 'मूल्यवान् वस्तु का खरीददार बहुत समय बाद कोई विरला ही मिलता है; किन्तु अल्पमूल्य वस्तुओं के खरीदारों की कमी नहीं रहती है।'

( २ ) इसी प्रकार व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए।

( ३ ) स्थलमार्ग और जलमार्ग में से जलमार्ग द्वारा व्यापार करना श्रेयस्कर है; क्योंकि उसमें श्रम तथा व्यय अधिक नहीं करना पड़ता और उसके द्वारा माल आसानी से लाया-ले-जाया जा सकता है—ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है।

( ४ ) इसके विपरीत आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'विपत्तिकाल में जलमार्ग सब ओर से रोका जा सकता है। सभी ऋतुओं में उससे जाना-आना भी नहीं हो सकता है। स्थल मार्ग की अपेक्षा वह भयजनक और अप्रतीकारक भी है। किन्तु स्थल मार्ग में ये सभी दिक्कतें नहीं होती हैं। इसलिए स्थलमार्ग ही श्रेष्ठ है।'

( ५ ) जलमार्ग दो प्रकार का होता है : एक तो किनारे-किनारे का मार्ग ( कूलपथ ) और दूसरा जल के बीच का मार्ग ( संयानपथ )। इन दोनों में कूलपथ ही श्रेष्ठ होता है, क्योंकि उस पर अनेक व्यापारिक नगर बसे होते हैं, जिससे बड़ा लाभ उठाया जा सकता है। अथवा संयानपथ भी उत्तम समझना चाहिए; क्योंकि नदी में निरन्तर पानी भरा रहता है, जिससे मार्ग में कोई उत्कट बाधा उपस्थित नहीं हो पाती है।

( ६ ) 'स्थलमार्ग में भी दक्षिणापथ की अपेक्षा उत्तरापथ श्रेष्ठ है, क्योंकि उस

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