कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ११७ : अ० १३ ] पार्ष्णिग्राह-चिन्ता ५२१
(१) अरिमित्रेण मित्रं च पुरस्तादवघट्टयेत् ।
मित्रमित्रमरेश्चापि मित्रमित्रेण वारयेत् ॥
(२) मित्रेण ग्राहयेत्पार्ष्णिमभियुक्तोऽभियोगिनः ।
मित्रमित्रेण चाक्रन्दं पार्ष्णिग्राहात्निवारयेत् ॥
(३) एवं मण्डलमात्मार्थं विजिगीषुर्निवेशयेत् ।
पृष्ठतश्च पुरस्ताच्च मित्रप्रकृतिसम्पदा ॥
(४) कृत्स्ने च मण्डले नित्यं दूतान् गूढांश्च वासयेत् ।
मित्रभूतः सपत्नानां हत्वा हत्वा च संवृतः ॥
(५) असंवृतस्य कार्याणि प्राप्तान्यपि विशेषतः ।
निस्संशयं विपद्यन्ते भिन्नप्लव इवोदधौ ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे पार्ष्णिग्राहचिन्ता नाम त्रयोदशोऽध्यायः आदितो दशोत्तरशततमः ।
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( १ ) इस प्रकार अपने पीछे का प्रबन्ध कर सामने से कोई शत्रु मुकाबले में आये तो उससे अपने मित्र को भिड़ा दे । मदद के लिए यदि शत्रु के मित्र का मित्र आवे तो उसका मुकाबला अपने मित्र के मित्र से करे ।
( २ ) यदि विजिगीषु के ऊपर ही चढ़ाई की गई हो तो अपने मित्र को अपने उस आक्रमणकारी का पार्ष्णिग्राह बना दे । यदि आक्रमणकारी का कोई मित्र उस पार्ष्णिग्राह का मुकाबला करने के लिए आवे तो उस अपने मित्र पार्ष्णिग्राह के मित्र द्वारा उसका निवारण करे ।
( ३ ) इस प्रकार विजिगीषु, मित्ररूप प्रकृति की पूर्वोक्त गुणसमृद्धि से युक्त राज-मण्डल को अपनी सहायता के लिए आगे और पीछे ठीक तरह से स्थापित करे ।
( ४ ) अपनी सहायता के लिए स्थापित किये हुए उस संपूर्ण राजमण्डल में गुप्तचरों और दूतों का सदा उत्तम प्रबंध रखे और शत्रुओं के साथ ऊपर से मित्रता के भाव रखकर एक-एक करके उन्हें मार दे तथा ऊपर से उदासीन एवं निष्पक्ष बना रहे ।
( ५ ) जो राजा अपने गुप्त विचारों या गुप्त मन्त्रणाओं को छिपा कर नहीं रख सकता है वह उच्चतावस्था में पहुँचकर भी नीचे गिर जाता है । समुद्र में नाव के फट जाने से जो दशा सवार की होती है, ठीक वही दशा मन्त्र के फूट जाने पर राजा की होती है ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में पार्ष्णिग्राहचिन्ता नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ।
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