भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 606
प्रकरण ११८# हीनशक्तिपूरणम्
अध्याय १४

(१) सामवायिकैरेवमभियुक्तो विजिगीषुर्यस्तेषां प्रधानस्तं ब्रूयात्— ‘त्वया मे सन्धिः, इदं हिरण्यमहं च मित्रम्, द्विगुणा ते वृद्धिः, नार्हस्यात्म-क्षयेण मित्रमुखानमित्रान् वर्धयितुम्, एते हि वृद्धास्त्वामेव परिभविष्यन्ति’।

(२) भेदं वा ब्रूयात्—‘अनपकारो यथाऽहमेतैः सम्भूयाभियुक्तः तथा त्वामप्येते संहितबलाः स्वस्था व्यसने वाऽभियोक्ष्यन्ते । बलं हि चित्तं विकरोति, तदेषां विघातय’ इति ।

(३) भिन्नेषु प्रधानमुपगृह्य हीनेषु विक्रमयेत् । हीनाननुग्राह्य वा प्रधाने । यथा वा श्रेयोऽभिमन्येत, तथा । वैरं वा परैर्ग्राहयित्वा विसं-वादयेत् ।


दुर्बल विजिगीषु के लिए शक्ति-संचय के साधन

( १ ) यदि अनेक राजा मिलकर विजिगीषु पर एक साथ आक्रमण करें तो विजिगीषु उन राजाओं के मुखिया से इस प्रकार कहे : 'मैं आपसे संधि करना चाहता हूँ; यह रहा हिरण्य । अब से मैं आपका मित्र हूँ । आपका भी दुगुना लाभ हो गया है । इसलिए अपने जन-धन का नुकसान कर इन ऊपरी मित्रों को बढ़ावा देना अब आपको उपयुक्त नहीं है । बाद में ये आप पर ही टूट पड़ेंगे । इसलिए आपको इनका साथ नहीं देना चाहिए ।'

( २ ) यदि ऐसा संभव न हो तो उनकी आपस में फूट करा दे । फूट डालने के लिए वह कहे कि 'जैसे मुझ निरपराध पर इन सबने आक्रमण किया है, वैसे स्वयं उन्नत होने पर या आपके विपत्तिकाल ये आप पर भी अवश्य आक्रमण करेंगे क्योंकि एकत्र बल अवश्य ही चित्त को विकृत कर देता है । इसलिए आपके लिए उचित यही है कि अभी से आप इनके संगठित बल को छिन्न-भिन्न कर दें ।'

( ३ ) इस प्रकार जब उनमें फूट हो जाय तब उनमें किसी प्रधान को अग्रसर करके हीनबल वाले शत्रु पर आक्रमण कर दे । अथवा हीनबल वाले राजाओं को अपनी ओर मिलाकर सामवायिकों के प्रधान पर ही चढ़ाई कर दे । अथवा जिस तरह अपना काम बन सके, वैसा करे । अथवा उनमें से प्रत्येक के हृदय में परस्पर घृणाभाव पैदा कर उन्हें विघटित कर दे ।