भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ११८ : अ० १४ ] शक्ति-संचय के साधन ५२३

(१) फलभूयस्त्वेन वा प्रधानमुपजाप्य सन्धि कारयेत् । अथोभयवेतनाः फलभूयस्त्वं दर्शयन्तः सामवायिकान् 'अतिसंहिताः स्थ' इत्युद्दूषयेयुः । दुष्टेषु सन्धि दूषयेत् । अथोभयवेतना भूयो भेदमेषां कुर्युः—'एवं तद्यदस्माभिर्दर्शितम्' इति । भिन्नेष्वन्यतमोपग्रहेण वा चेष्टेत । (२) प्रधानाभावे सामवायिकानामुत्साहयितारं स्थिरकर्माणमनुरक्तप्रकृतिं लोभाद्भयाद्वा सङ्घातमुपगतं विजिगीषोर्भीतं राज्यप्रतिसम्बन्धं मित्रं चलामित्रं वा पूर्वानुत्तराभावे साधयेत् । (३) उत्साहयितारमात्मनिसर्गेण, स्थिरकर्माणं सान्त्वप्रणिपातेन, अनुरक्तप्रकृतिं कन्यादानयापनाभ्यां, लुब्धमंशद्वैगुण्येन, भीतमेभ्यः कोशदण्डानुग्रहेण, स्वतो भीतं विश्वासयेत्प्रतिभूप्रदानेन, राज्यप्रतिसम्बन्धमेकी-


( १ ) अथवा बहुत-सा धन देकर उस मुखिया को फोड़ ले और खुद जाकर दूसरे राजाओं से चुपचाप सन्धि कर ले । उसके बाद विजिगीषु के उभय वेतन भोगी गुप्तचर उन संगठित राजाओं से, मुखिया को मिली भारी रकम की बात सुनाते हुए उनसे 'तुम सबको उसने ठग लिया है' ऐसा कह कर भड़काये । जब संगठित राजा मुखिया के विरुद्ध हो जाँय तो मुखिया के साथ की गई संधि को तोड़ दे । उसके बाद उभयवेतनभोगी गुप्तचर कहे 'देखो, मैंने पहिले ही कहा था कि मुखिया राजा ने भारी रकम मारी है । तभी तो गड़बड़ हो जाने के कारण इसने विजिगीषु के साथ संधि को तोड़ दिया है । हम इस बात को पहले ही कह चुके थे ।' जब वे आपस में फूट जाँय तो दोनों पक्षों में से किसी एक का सहारा लेकर पक्ष के साथ लड़ाई आरंभ कर दे ।

( २ ) यदि उन संगठित राजाओं से कोई प्रधान न हो तो उनको उत्साहित करने वाला, स्थिरकर्मा, अनुरक्तप्रकृति, लोभ या भय से संधि में शामिल न होने वाला, विजिगीषु से भयभीत, अपने राज्य से संबन्धित, अपना ही मित्र और चल शत्रु हो तो इन्हें ही वश में करना चाहिए । इनमें अगले-अगले राजा को वश में करने का यत्न करे ।

( ३ ) उत्साही राजा से विजिगीषु यों कहे 'मैं अपनी सारी प्रकृति और पुत्रादिसहित आपके अधीन हूँ । अपनी इच्छानुसार जिस कार्य पर चाहें मुझे लगा सकते हैं; किन्तु मेरा उच्छेद न कीजिए ।' इस प्रकार आत्मसमर्पण करके उसको वश में करे । स्थिरकर्मा को 'आपने मुझे जीत लिया है' कह कर वश में करे । अनुरक्तप्रकृति राजा को अपनी कन्या देकर वश में करे । लोभी राजा को दुगुना हिस्सा देकर; अपने आप से डरे हुए राजा को विश्वास दिला कर वश में करे । इसी प्रकार अपने राज्य से संबंध रखने वाले राजा को—मैं और आप एक ही हैं । मेरी पराजय में आपकी