भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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५२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

भावोपगमनेन, मित्रमुभयतः प्रियहिताभ्यामुपकारत्यागेन वा, चलामित्रमवधूतमनपकारोपकाराभ्याम् ।

(१) यो वा यथायोगं भजेत, तं तथा साधयेत् । सामदानभेददण्डैर्वा यथापत्सु व्याख्यास्यामः ।

(२) व्यसनोपघातत्वरितो वा कोशदण्डाभ्यां देशे काले कार्ये वावधृतं सन्धिमुपेयात् । कृतसन्धिर्हीनमात्मानं प्रतिकुर्वीत ।

(३) पक्षे हीनो बन्धुमित्रपक्षं कुर्वीत, दुर्गमविषह्यं वा । दुर्गमित्रप्रतिस्तब्धो हि स्वेषां परेषां च पूज्यो भवति ।

(४) मन्त्रशक्तिहीनः प्राज्ञपुरुषोपचयं विद्यावृद्धसंयोगं वा कुर्वीत । तथाहि सद्यः श्रेयः प्राप्नोति ।

(५) प्रभावहीनः प्रकृतियोगक्षेमसिद्धौ यतेत । जनपदः सर्वकर्मणां योनिः, ततः प्रभावः ।


भी पराजय है । दूसरों के साथ मिल कर मुझ पर आक्रमण करना आपको शोभा नहीं देता है ।' ऐसी आत्मीयता का भाव जताकर अपने वश में करे । मित्र राजा को प्रिय और हितकर वचनों से तथा उससे लिया गया कर उसे वापिस दे, इस प्रकार अपने वश में करे । अस्थिर शत्रु राजा को, उसका उपकार करने तथा अपकार न करने की प्रतिज्ञा से, वश में करे ।

( १ ) अथवा इन संगठित राजाओं में जो जिस तरीके से वश में किया जा सके उसके साथ वैसा ही व्यवहार करे; अथवा साम, दाम आदि उपायों से उनको वश में करे; जैसा कि आपत्प्रकरण में आगे बताया जायेगा ।

( २ ) अथवा विजिगीषु राजा आसन्न विपत्ति को शीघ्र ही दूर करने की इच्छा रखकर संगठित राजाओं से, सेना और कोष के द्वारा सहायता देने की शर्त पर, संधि कर ले और अपनी कमजोरियों को दूर करने का यत्न करे ।

( ३ ) मित्र-रहित विजिगीषु को चाहिए कि वह अधिकाधिक राजाओं को अपना मित्र बनाये । या अभेद्य दुर्गों को बनवाये, क्योंकि मित्रसंपन्न और दुर्गसंपन्न विजिगीषु के विरोध में कोई खड़ा नहीं हो सकता है ।

( ४ ) बुद्धिवल ( मंत्रशक्ति ) से हीन राजा को चाहिए कि वह बुद्धिमान् पुरुषों का संग्रह कर विद्यावृद्ध एवं अनुभवी व्यक्तियों की संगति करे । ऐसा करने से राजा शीघ्र ही अपना कल्याण करता है ।

( ५ ) प्रभुशक्ति ( प्रभाव ) से हीन राजा को चाहिए कि वह अपनी अमात्य प्रकृति तथा प्रयोजनों के योग-क्षेम के लिए महान् यत्न करे । क्योंकि जनपद ही सभी