कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ११८ : अ० १४ ] शक्ति-संचय के साधन ५२५
(१) तस्य स्थानमात्मनश्च आपदि दुर्गम् । (२) सेतुबन्धः सस्यानां योनिः । नित्यानुषक्तो हि वर्षगुणलाभः सेतुवापेषु । (३) वणिक्पथः परातिसन्धानस्य योनिः, वणिक्पथेन हि दण्डगूढपुरुषातिनयनं शस्त्रावरणयानवाहनक्रयश्च क्रियते । प्रवेशो निर्नयनं च । (४) खनिः संग्रामोपकरणानां योनिः । (५) द्रव्यवनं दुर्गकर्मणां, यानरथयोश्च । (६) हस्तिवनं हस्तिनाम् । (७) गजाश्वखरोष्ट्राणां च व्रजः । (८) तेषामलाभे बन्धुमित्रकुलेभ्यः समार्जनम् । (९) उत्साहहीनः श्रेणीप्रवीरपुरुषाणां चोरगणाटविकम्लेच्छजातीनां परापकारिणां गूढपुरुषाणां यथालाभमुपचयं कुर्वीत ।
कार्यों की सिद्धि का मूल है। उसी से कोष तथा सेना का संग्रह और दुर्गों का निर्माण किया जाता है। तभी प्रभावशाली बना जा सकता है।
( १ ) उस प्रभाव का मूल दुर्ग ही है और उसी दुर्ग से विपत्तिकाल में अपनी भी रक्षा होती है।
( २ ) अन्न आदि की उत्पत्ति के प्रमुख कारण बांध हैं। क्योंकि जो अन्न हमें केवल वृष्टि के द्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं, बांधों एक जलाशयों के द्वारा उन अन्नों को को हम सदा ही प्राप्त कर सकते हैं।
( ३ ) व्यापारिक मार्ग शत्रुओं को धोखा देने के प्रधान कारण हैं, क्योंकि इन्हीं मार्गों द्वारा शत्रुदेश में सेना, तीक्ष्ण, रसद आदि पुरुषों को तथा अस्त्र, शस्त्र को भेजा जा सकता है और घोड़े आदि के क्रय-विक्रय का कार्य शत्रु देश में किया जा सकता है। इन्हीं मार्गों के द्वारा दूसरे देशों के साथ वस्तु-विनिमय और यातायात होता है।
( ४ ) युद्ध के सभी उपकरणों का मूल स्थान खान है।
( ५ ) दुर्गों और राजप्रासादों के मूल कारण लकड़ियों के जंगल हैं। इसी प्रकार रथ तथा अन्य सवारियों के कारण भी जंगल ही है।
( ६ ) हाथियों की उत्पत्ति के मूल कारण हस्तिवन हैं।
( ७ ) हाथी, घोड़े, गधे और ऊँट आदि पशुओं की उत्पत्ति का कारण व्रज ( गोष्ठ ) है।
( ८ ) यदि उपर्युक्त साधन अपने राज्य में उपलब्ध या उत्पन्न न हों तो उन्हें अपने मित्रों तथा बंधुओं के कुलों से प्राप्त करना चाहिए।
( ९ ) उत्साहहीन राजा को चाहिए कि वह श्रेणीपुरुषों, शूरवीरों, शत्रुओं का