कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ११९-१२० : अ० १५ ] शत्रु के साथ व्यवहार ५२९
हनिष्यामि । स्वयमधिष्ठितेन वा योगप्रणिधानेन क्षयव्ययमेनमुपनेष्यामि । क्षयव्ययप्रवासोपतप्ते वास्य मित्रवर्गे सैन्ये वा क्रमेणोपजापं प्राप्स्यामि । वीवधासारप्रसारवधेन वास्य स्कन्धावारावग्रहं करिष्यामि । दण्डोपनयेन वास्य रन्ध्रमुत्थाप्य सर्वसन्दोहेन प्रहरिष्यामि । प्रतिहतोत्साहेन वा यथेष्टं सन्धिमवाप्स्यामि । मयि प्रतिबन्धस्य वा सर्वतः कोपाः समुत्थास्यन्ति । निरासारं वास्य मूलं मित्राटवीदण्डैरुद्घाटयिष्यामि । महतो वा देशस्य योगक्षेममिहस्थः पालयिष्यामि । स्वविक्षिप्तं मित्रविक्षिप्तं वा मे सैन्यमिहस्थस्यैकस्थमविषह्यं भविष्यति । निम्नखातरात्रियुद्धविशारदं वा मे सैन्यं पथ्याबाधमुक्तमासन्ने कर्मणि करिष्यति । विरुद्धदेशकालमिहागतो वा स्वय-
दूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ४. अथवा यदि समझे कि हथियार, अग्नि, विष आदि का प्रयोग करने वाले गुप्तचरों द्वारा या औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट प्रयोगों द्वारा पास आये आक्रमणकारी को मरवा डालूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ५. अथवा यदि समझे कि स्वयं अधिष्ठित या योगप्रणिधान द्वारा शत्रु का अच्छी तरह क्षय-व्यय कर सकूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ६. अथवा यदि समझे कि क्षय-व्यय और प्रवास से संतप्त शत्रु के मित्रवर्ग तथा सेना में धीरे-धीरे भेद डाल दूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ७. अथवा यदि समझे कि शत्रु देश से आने वाले खाद्यपदार्थ, मित्रबल तथा घास, भूसा और ईंधन आदि को बीच में ही नष्ट करके शत्रु की छावनी को पीड़ित कर सकूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ८. अथवा यदि समझे कि अपनी कुछ सेना को शत्रु की छावनी में छिपे तौर से ले जाकर उसकी निर्बलताओं का पता लगाऊँगा और तब पूरे सैन्यबल के साथ उस पर हमला बोल दूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ६. अथवा यदि समझे कि किसी तरह शत्रु के उत्साह को दबा करके उसके साथ संधि कर लूंगा, या मुझ पर आक्रमण करने वाले शत्रु पर सारा राज-मंडल कुपित हो उठेगा तो दुर्ग का आश्रय ले । १०. अथवा यदि समझे कि मित्र द्वारा प्राप्त उसकी सैनिक सहायता को रोक कर उसकी राजधानी को अपने मित्रबल और आटविकों द्वारा रौंदा दूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ११. अथवा यह समझे कि यहीं रहकर मैं अपने महान् देश का योग-क्षेम करता रहूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । १२. अथवा यदि समझे कि यहीं पर रह कर मेरे अथवा मित्र के कार्य से अन्यत्र भेजी हुई सेना यहाँ आकर मेरे साथ मिली रहेगी और शत्रु के वश में न हो सकेगी तो दुर्ग का आश्रय ले । १३. अथवा यदि समझे कि जमीन के नीचे खाई खोदकर और रात में युद्ध करने में चतुर मेरी सेना रास्ते की थकावट को दूर करके अवसर आने पर अच्छी तरह कार्य कर सकेगी तो दुर्ग का आश्रय ले । १४. अथवा यदि समझे कि प्रतिकूल देश-काल में आये हुए आक्रमणकारी को अपने आप क्षय-व्यय भुगतना पड़ेगा तो दुर्ग का आश्रय ले । १५. अथवा यदि समझे कि इस देश पर अति क्षय-व्यय सहन करने वाला राजा ही चढ़ाई कर पायेगा, क्योंकि यहाँ दुर्ग, जंगल और बहि-
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