कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
मेव क्षयव्ययाभ्यां न भविष्यति । महाक्षयव्ययाभिगम्योऽयं देशो दुर्गाटव्य-पसारबाहुल्यात्, परेषां व्याधिप्रायः, सैन्यव्यायामानामलब्धभौमश्च, तमापद्गतः प्रवेक्ष्यति । प्रविष्टो वा न निर्गमिष्यति' इति ।
(१) कारणाभावे बलसमुच्छ्रये वा परस्य दुर्गमुन्मुच्यापगच्छेत् । अग्निपतङ्गवदमित्रे वा प्रविशेत् । अन्यतरसिद्धिर्हि त्यक्तात्मनो भवतीत्याचार्याः।
(२) नेति कौटिल्यः । सन्धेयतामात्मनः परस्य चोपलभ्य सन्दधीत । विपर्यये विक्रमेण सिद्धिमपसारं वा लिप्सित ।
(३) सन्धेयस्य वा दूतं प्रेषयेत् । तेन वा प्रेषितमर्थमानाभ्यां सत्कृत्य ब्रूयात्—इदं राज्ञः पण्यागारम्, इदं देवीकुमाराणां देवीकुमारवचनाद्, इदं राज्यमहं च त्वदर्पणः इति ।
(४) लब्धसंश्रयः समयाचारिकवद्भर्तरि वर्तेत । दुर्गादीनि च कर्माण्यावाहविवाहपुत्राभिषेकाश्वपण्यहस्तिग्रहणसत्रयात्राविहारगमनानि चानुज्ञातः कुर्वीत । स्वभूम्यवस्थितप्रकृतिसन्धिमुपघातमपसृतेषु वा सर्वमनुज्ञातः
र्गमी मार्गों की अधिकता है तो दुर्ग का आश्रय ले । १६. और यदि समझे कि विदेश से आने वाले लोगों के लिये यह स्थान कष्टकर है । सेनाओं की कवायद के लिए भी यहाँ उचित भूमि नहीं है । इसलिये प्रत्येक आक्रमणकारी यहाँ आपद्ग्रस्त होगा । यदि किसी तरह वह यहाँ आ भी गया तो फिर उसका बाहर सकुशल निकलना कठिन है तो अवश्य ही दुर्ग का आश्रय ले ।
( १ ) यदि उक्त परिस्थितियाँ न हों और शत्रु की सेना बहुत बलवान् एवं बहुसंख्यक हो तो पूर्वाचार्यों का कहना है कि या तो दुर्ग छोड़ कर चले जाना चाहिए अथवा अग्नि में पतंगे के समान शत्रु-सैन्य पर पिल पड़ना चाहिए । क्योंकि आत्म-मोह छोड़ कर इस प्रकार लड़ाई में कूद पड़ने पर कभी-कभी जीत भी हो जाती है ।
( २ ) इसके विपरीत कौटिल्य का कहना है कि पहिले तो शत्रु की और अपनी योग्यता को देखकर संधि कर लेनी चाहिए । यदि संधि होनी किसी तरह भी संभव न हो तो पराक्रम के द्वारा ही सिद्धिलाभ करना चाहिए । अथवा यदि समझे कि संधि होनी सर्वथा ही असंभव है तो स्थान को ही छोड़ दे ।
( ३ ) अथवा उक्त स्थिति में किसी धर्मविजेता शक्तिशाली राजा के पास अपना दूत भेजे । अथवा उसके भेजे हुए दूत को धन-मान से संतुष्ट कर उससे कहे, यह मेरी मूल्यवान् भेंट विजेता के लिए और यह महारानी तथा राजकुमारों की भेंट विजेता की महारानी एवं राजकुमारों के लिए लेते जायें । उनको मेरा यह संदेश भी पहुँचा दीजिए कि मेरे तथा इस राज्य के मालिक भी वे ही हैं ।
( ४ ) इस युक्ति से यदि विजेता का आश्रय मिल जाय तो समय को देखते हुए उसके साथ विजिगीषु सेवक की तरह व्यवहार करे और दुर्ग आदि कार्यों के निर्माण, विवाह, पुत्र का राज्याभिषेक, घोड़े खरीदने, हाथियों को पकड़ने, यज्ञ करने, तीर्थाटन