कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 618, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ सातवां अधिकरण |
|---|
(१) यदमित्रमेकतः प्रतिकरोति तदेकतोभोगि। यदमित्रमासारं चापकरोति तदुभयतोभोगि। यदमित्रासारप्रतिवेशाटविकान् सर्वतः प्रतिकरोति तत्सर्वतोभोगि। (२) पाष्णिग्राहश्चाटविकः शत्रुमुख्यः शत्रुर्वाद भूमिदानसाध्यः कश्चिदासाद्येत, निर्गुणया भूम्यैनमुपग्राहयेत्, अप्रतिसम्बद्धया दुर्गस्थम्, निरुपजीव्ययाटविकम्, प्रत्यादेयया तत्कुलीनम्, शत्रोरुपच्छिन्नया शत्रोरुपरुद्धम्, नित्यामित्रया श्रेणीबलम्, बलवत्सामन्तया संहतबलम्, उभाभ्यां युद्धे प्रतिलोमम्, अलब्धव्यायामयतोत्साहिनम्, शून्ययारिपक्षीयम्, कर्काशितयापवाहितम्, महाक्षयव्ययनिवेशया गतप्रत्यागतम्, अनुपाश्रयया प्रत्यपसृतम्, परेणानधिवास्यया स्वयमेव भर्तारमुपग्राहयेत्।
( १ ) अनर्थ का निवारण करके उपकार करने वाले मित्र-राजाओं में से जो राजा एक ही शत्रु का प्रतीकार करके विजिगीषु का उपकार करता है वह एकतोभोगी, जो मित्रराजा शत्रु और शत्रुमित्र ( आसार ), इन दोनों का प्रतीकार करके विजिगीषु का उपकार करता है वह उभयतोभोगी, और जो मित्रराजा शत्रु, शत्रु-मित्र, पड़ोसी शत्रुराजा ( प्रतिवेशी ) तथा आटविक आदि सबका प्रतीकार करके विजिगीषु का उपकार करता है वह सर्वतोभोगी कहा जाता है।
( २ ) यदि पाष्णिग्राह, आटविक, शत्रु की अमात्य प्रकृति अथवा स्वयं शत्रु राजा ही भूमि देने पर अधीनता स्वीकार कर ले तो गुणरहित ( ऊसर ) भूमि देकर ही उसे अपने अधीन किया जाय। यदि पाष्णिग्राह आदि दुर्ग में रहते हों तो उन्हें ऐसी भूमि दी जाय, जिसका दुर्ग से कोई संबंध न हो। आटविक को ऐसी भूमि दी जाय, जिसमें कृषि आदि न हो सके। शत्रुकुल के व्यक्तियों को ऐसी भूमि दी जाय, जिसका किसी समय अपहरण किया जा सके। नजरबंद शत्रु के पुत्र आदि को ऐसी भूमि दी जाय, जिसको शत्रु से छीना गया हो। श्रेणीबल ( नेतारहित सेना ) को ऐसी भूमि दी जाय, जिसमें नित्य ही उपद्रव होते हों। संहतबल ( नेतासहित सेना ) को ऐसी भूमि दी जाय, जिसका सामन्त अत्यधिक बलवान् हो। कूट युद्ध करने वाले शत्रु को ऐसी भूमि दी जाय, जहाँ सदा ही उपद्रव होते हैं, तथा जिसका सामन्त भी अधिक बलवान् हो। उत्साही शत्रु को ऐसी भूमि दी जाय, जिसमें सेना की कवायद के लिए स्थान न हो। शत्रुपक्ष के किसी भी व्यक्ति को ऐसी भूमि दी जाय, जो कि किसी काम की न ( शून्य ) हो। सन्धि करके फिर तोड़ देने वाले राजा को ऐसी भूमि दी जाय, जिसमें सदैव शत्रु सेना एवं आटविक के उपद्रव होते हों। एक बार शत्रु से मिलकर जो फिर अपने से मिलना चाहे उसको ऐसी भूमि दी जाय, जिसको बसने योग्य बनाने के लिए अत्यधिक पुरुषों का क्षय एवं धन का व्यय करना पड़े।