कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १२१ : अ० १६ ] अधीनस्थ राजाओं से व्यवहार ५३५
(१) तेषां महोपकारं निर्विकारं चानुवर्तेत् । प्रतिलोममुपांशुना साधयेत् । उपकारिणमुपकारशक्त्या तोषयेत् । प्रयासतश्चार्थमानौ कुर्यात् । व्यसनेषु चानुग्रहम् । स्वयमागतानां यथेष्टदर्शनं प्रतिविधानं च कुर्यात् । परिभवोपघातकुत्सातिवादांश्चैषु न प्रयुञ्जीत । दत्त्वा चाभयं पितेवानुगृह्णीयात् । यश्चास्यापकुर्यात्तद्दोषमभिविख्याप्य प्रकाशमेनं घातयेत् । परोद्वेगकारणाद्वा दाण्डकर्मिकवच्चेष्टेत । न च हतस्य भूमिद्रव्यपुत्रदारानभिमन्येत । कुल्यानप्यस्य स्वेषु पात्रेषु स्थापयेत् । कर्मणि मृतस्य पुत्रं राज्ये स्थापयेत् ।
शत्रु के डर से अपने देश में शरण पाये पुरुष को ऐसी भूमि देकर वश में करना चाहिए, जो कि दुर्ग आदि से रहित हो । और जिस भूमि में उसके असली मालिक की सेवा में कोई नहीं टिक सकता उस भूमि को उसके असली मालिक को लौटाकर उसे वश में किया जाय ।
(१) अपने अधीनस्थ राजाओं में से जो राजा विजेता का महान् उपकार करता हो तथा उसकी ओर से अपने मन में कोई कलुष न रखता हो, उसके साथ ऐसा व्यवहार रखा जाय जिससे उसको किसी भी प्रकार की हानि न पहुँचे । किन्तु जो विरुद्ध आचरण करे उसे उपांशुदंड से सीधा किया जाय, क्योंकि प्रकट दण्ड से अन्य वशीभूत राजाओं में उद्वेग फैलने की सम्भावना रहती है । अपना उपकार करने वाले प्रत्येक राजा को सदैव सन्तुष्ट रखा जाय और श्रम-सहयोग के अनुसार उसको यथोचित धन-सत्कार दिया जाय । उसके ऊपर किसी प्रकार की विपत्ति आ पड़े तो सान्त्वना, सहानुभूति से सदैव उस पर अनुग्रह रखा जाय । यदि ऐसे शुभचिन्तक राजा बिना बुलाये ही अपने राज्य में आ जाँय तो उनके साथ अच्छी तरह प्रेमपूर्वक मिला जाय । किन्तु उनकी ओर से किसी भी प्रकार की बुराई की आशंका हो तो उनसे अपनी रक्षा करने के लिए हर समय सतर्क रहा जाय । इस प्रकार के अधीनस्थ राजाओं के सम्बन्ध में तिरस्कार, कटुवाक्य, निन्दा या अति स्तुति आदि का प्रयोग कभी न किया जाय । अभयदान देकर उन पर पिता के समान अनुग्रह करता जाय । किन्तु उनमें जो भी विजेता का अपकार करे, उसके उस अपराध को सर्वत्र प्रचारित कराके प्रकट रूप में उसका वध करवा दिया जाय । यदि इस बात का भय हो कि प्रकट-दण्ड देने से दूसरे अधीनस्थ राजा भड़क उठेंगे तो दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों से उसका प्रतीकार किया जाय । अर्थात् उसको उपांशुदंड दिया जाय । किन्तु इस प्रकार से दण्डित राजा की भूमि, द्रव्य, पुत्र, स्त्री आदि का अपहरण न किया जाय । बल्कि उन सबको तथा उनके दूसरे सम्बन्धियों को भी यथोचित नौकरियों पर नियुक्त किया जाय । यदि किसी राजा को वश में करते समय युद्ध में उसकी मृत्यु हो जाय तो उसके पुत्र को राजा बनाया जाय ।