कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) एवमस्य दण्डोपनताः पुत्रपौत्राननुवर्तन्ते ।
(२) यस्तूपनतान् हत्वा बद्ध्वा वा भूमिद्रव्यपुत्रदारानभिमन्येत, तस्योद्विग्नं मण्डलमभावायोत्तिष्ठते । ये चास्यामात्याः स्वभूमिष्वायत्तास्ते चास्योद्विग्ना मण्डलमाश्रयन्ते । स्वयं वा राज्यं, प्राणान् वास्याभिमन्यन्ते ।
(३)
स्वभूमिषु च राजानस्तस्मात्साम्नानुपालिताः ।
भवन्त्यनुगुणा राज्ञः पुत्रपौत्रानुवर्तिनः ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे दण्डोपनायिवृत्तं नाम षोडशोऽध्यायः,
आदितस्त्रयोदशोत्तरशततमः ।
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( १ ) विजिगीषु राजा के इस प्रकार के सदाचरण से न केवल दण्डोपनत राजा उसकी अधीनता स्वीकार कर लेते हैं, बल्कि उसके पुत्र और पौत्र आदि के भी अनुगामी बन जाते हैं ।
( २ ) इसके विपरीत जो विजिगीषु राजा दण्डोपनत राजाओं को मार कर या उनको कैद में डाल कर उनके द्रव्य, स्त्री, पुत्र भूमि आदि का अपहरण करता है उससे कुपित हुआ सारा राज-मण्डल उसका विध्वंस करने के लिए तैयार हो जाता है । ऐसे विजिगीषु के अमात्य आदि उच्चाधिकारी उससे कुपित होकर बदला लेने की भावना से राज-मण्डल में जा मिलते हैं, अथवा स्वयं ही उसके राज्य या प्राणों पर अधिकार कर लेते हैं ।
( ३ ) इसलिए जो राजा अपनी-अपनी भूमि में रहकर राज्य का उपभोग करते रहते हैं, और जो विजिगीषु साम उपाय के द्वारा ही उनकी रक्षा करता है, वे उसके अनुकूल बने रहते हैं और उसके पुत्र-पौत्र आदि के भी अनुगामी बने रहते हैं ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में दण्डोपनायिवृत्त नामक
सोलहवां अध्याय समाप्त ।
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