भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 641

प्र० १२७ : अ० १ ] प्रकृतियों के व्यसन ५५७

कोशो दण्डः कुप्यं विष्टिर्वाहनं निचयाश्च जनपदादुत्तिष्ठन्ते । तेषामभावो जनपदाभावे । स्वाम्यमात्ययोश्चानन्तर इति ।

(१) नेति कौटिल्यः । अमात्यमूलाः सर्वारम्भाः । जनपदस्य कर्मसिद्धयः स्वतः परतश्च योगक्षेमसाधनं व्यसनप्रतीकारः शून्यानिवेशोपचयौ दण्डकरानुग्रहश्चेति ।

(२) जनपददुर्गव्यसनयोर्दुर्गव्यसनमिति पाराशराः । दुर्गे हि कोशदण्डोत्पत्तिरापदि स्थानं च जनपदस्य । शक्तिमत्तराश्च पौरा जानपदेभ्यो नित्याश्चापदि सहाया राज्ञः । जानपदास्त्वमित्रसाधारणा इति ।

(३) नेति कौटिल्यः । जनपदमूला दुर्गकोशदण्डसेतुवार्तारम्भाः । शौर्यं स्थैर्यं दाक्ष्यं बाहुल्यं च जनपदेषु । पर्वतान्तर्द्वीपाश्च दुर्गा नाध्युष्यन्ते जनपदा-


जनपद पर आया हुआ व्यसन अधिक भयावह होता है; क्योंकि कोष, सेना, वस्त्र, लोहा, ताँबा, भृत्यवर्ग, घोड़े, ऊँट, अन्न, घृत आदि जितना भी सामान है, सभी कुछ जनपद से प्राप्त होता है। जनपद विपत्तिग्रस्त होने के कारण उक्त सभी वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं और उसके बाद अमात्य एवं राजा आदि का भी विनाश हो जाता है।'

( १ ) परन्तु कौटिल्य, विशालाक्ष के उक्त मत को नहीं मानता है । वह कहता है कि 'सभी कार्य अमात्यों पर निर्भर होते हैं। दुर्ग तथा कृषि आदि कार्यों की सफलता, राजवंश, अन्तपाल और आटविकों की ओर से योग-क्षेम का साधन, आपत्तियों का प्रतिकार, उपनिवेशों की स्थापना एवं उनकी उन्नति, अपराधियों को दण्ड और राजकर का निग्रह आदि जनपद के सभी कार्य अमात्यों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। इसलिए जनपद की विपत्ति की अपेक्षा अमात्यों की विपत्ति चिंतनीय है' ।

( २ ) आचार्य पराशर के मातावलम्बी विद्वानों का कथन है कि 'जनपद और दुर्ग, इन दोनों के एक साथ विपत्तिग्रस्त हो जाने पर जनपद की अपेक्षा दुर्ग की विपत्ति अधिक भयावह है; क्योंकि कोष और सेना को दुर्ग में ही रखा जाता है। यदि जनपद पर कोई विपत्ति आ जाय तो दुर्ग ही उस समय आश्रय का एकमात्र स्थान होता है। नगर तथा नागरिकों की अपेक्षा दुर्ग अधिक अजेय तथा स्थायी होते हैं और किसी भी विपत्ति में वह सहायक होते हैं। दुर्गों की तुलना में जनपदवासियों को तो शत्रु के समान समझना चाहिए; क्योंकि शत्रु को भी कर आदि देकर वे उसकी सहायता करते हैं। इसलिए जनपद की विपत्ति की अपेक्षा दुर्गों की विपत्ति अधिक चिन्तनीय समझनी चाहिए।'

( ३ ) इस मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'दुर्ग, कोष, सेना, सेतुबन्ध और कृषि आदि कार्य जनपद पर ही निर्भर हैं और शूरता, स्थिरता, चतुरता एवं अधिकता आदि बातें जानपदों ( जनपद के पुरुषों ) में ही हो सकती हैं । यदि