भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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५५८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ आठवां अधिकरण

भावात् । कर्षकप्राये तु दुर्गव्यसनमायुधीयप्राये तु जनपदे जनपदव्यसनमिति ।

(१) दुर्गकोशव्यसनयोः कोशव्यसनमिति पिशुनः । कोशमूलो हि दुर्गसंस्कारो दुर्गरक्षणं च । दुर्गः कोशादुपजाप्यः परेषां । जनपदमित्रामित्रनिग्रहो देशान्तरितानामुत्साहनं दण्डबलव्यवहारः । कोशमादाय च व्यसने शक्यमपयातुं न दुर्गमिति ।

(२) नेति कौटिल्यः । दुर्गापर्णः कोशो दण्डस्तूष्णींयुद्धं स्वपक्षनिग्रहो दण्डबलव्यवहारः आसारप्रतिग्रहः परचक्राटवीप्रतिषेधश्च । दुर्गाभावे च कोशः परेषां । दृश्यते हि दुर्गवतामनुच्छित्तिरिति ।


जनपद पर ही आपत्ति आ जाय तो नदी और पर्वतों में बने बड़े-बड़े अजेय दुर्ग भी सूने पड़ जाते हैं । इसलिए दुर्ग-व्यसन की अपेक्षा जनपद-व्यसन ही अधिक चिन्ताकर समझना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता जरूर है कि जैसे-जनपदरहित दुर्ग सूने हो जाते हैं वैसे ही दुर्गरहित जनपदों में रहना भी दुष्कर हो जाता है । इसलिए इतना समझ लेना चाहिए कि कृषिप्रधान जनपदों के दुर्गों पर विपत्ति का आना अधिक खतरनाक है । इसी प्रकार आयुधप्रधान देशों पर विपत्ति का आना अधिक भयावह है ।'

( १ ) आचार्य पिशुन ( नारद ) का मत है कि 'दुर्ग और कोष, इन दोनों पर एक साथ ही आई विपत्ति अधिक भयावह है; क्योंकि दुर्ग की मरम्मत एवं उसकी रक्षा कोष पर ही निर्भर है । कोष के बल पर दुर्ग का भी उच्छेद किया जा सकता है । कोष के ही द्वारा जनपद; शत्रु और मित्र आदि सब का निग्रह किया जा सकता है । दूरदेशस्थ राजाओं को भी कोष के ही बल पर सहायता के लिए प्रेरित किया जा सकता है । सैनिक-शक्ति का उपयोग भी कोष पर ही निर्भर है । यदि आकस्मिक आपत्ति टूट पड़े तो भागते समय कोष को भी साथ ले जाया जा सकता है; किन्तु ऐसी दशा में दुर्ग को साथ नहीं ले जाया जा सकता है ।'

( २ ) पिशुन के मत का विरोध करते हुए कौटिल्य का कहना है कि 'कोष और सेना दोनों की रक्षा दुर्ग के द्वारा की जा सकती है । तूष्णींयुद्ध, अपने पक्ष के राजद्रोहियों का निग्रह, सैनिक शक्ति का आश्रय और शत्रु-सेना तथा आटविकों का प्रतीकार सभी कार्य दुर्ग के द्वारा किए जा सकते हैं । दुर्ग के नष्ट हो जाने पर बहुत संभव है कि कोष को भी शत्रु छीन ले; क्योंकि तब उसकी रक्षा का कोई साधन नहीं रह जाता है । ऐसा भी देखा गया है कि जिनके पास पर्याप्त कोष नहीं; किन्तु दुर्जेय दुर्ग है, उनका उच्छेद सहसा नहीं किया जा सकता है । इसलिए कोष की अपेक्षा दुर्ग-व्यसन ही अधिक कष्टकर समझना चाहिए ।'

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