कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 643, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० १२७ : अ० १ ] प्रकृतियों के व्यसन ५५९
(१) कोशदण्डव्यसनयोर्दण्डव्यसनम् इति कौणपदन्तः । दण्डमूलो हि मित्रामित्रनिग्रहः परदण्डोत्साहनं स्वदण्डप्रतिग्रहश्च । दण्डाभावे च ध्रुवः कोशविनाशः । कोशाभावे च शक्यः कुप्येन भूम्या परभूमिस्वयंग्रहणेन वा दण्डः पिण्डयितुम् । दण्डवता च कोशः । स्वामिनश्चासन्नवृत्तित्वादमात्य-सधर्मा दण्ड इति ।
(२) नेति कौटिल्यः । कोशमूलो हि दण्डः । कोशाभावे दण्डः परं गच्छति, स्वामिनं वा हन्ति । सर्वाभियोगकरश्च कोशो धर्महेतुः । देशकाल-कार्यवशेन तु कोशदण्डयोरन्यतरः । प्रमाणीभवति । लम्भपालनो हि दण्डः कोशस्य । कोशः कोशस्य दण्डस्य च भवति । सर्वद्रव्यप्रयोजकत्वात्कोश-व्यसनं गरीय इति ।
( १ ) आचार्य कौणपदन्त ( भीष्म ) का कहना है कि कोष और सेना, दोनों के व्यसनों में सेना-व्यसन ही अधिक कष्टकर है; क्योंकि शत्रु तथा मित्र का निग्रह सेना द्वारा ही होता है; दूसरे की सेना को अपनी सेना द्वारा ही कार्य पर नियुक्त किया जा सकता है । अपनी सेना का अधिक संग्रह भी सेना के ही द्वारा किया जा सकता है । अपनी सैनिक शक्ति क्षीण हो जाने पर ही विजिगीषु, शत्रु की अपेक्षा में अपनी सेना को आगे नहीं बढ़ा पाता है । यदि सेना पर विपत्ति पड़ जाय तो निश्चित ही कोष भी नष्ट हो जाता है; क्योंकि उसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं रह जाता है । कोष के अभाव में भी वस्त्राभरण के द्वारा, भूमि के द्वारा, बलात् अपहृत शत्रुद्रव्य के द्वारा सेना का संगठन किया जा सकता है; और तब कोष को भी जमा किया जा सकता है । सदा राजा के समीप रहने के कारण सेना को भी अमात्यों के ही समान उपकारक समझना चाहिए । इसलिए कोष की अपेक्षा सेना-व्यसन अधिक भययुक्त है ।'
( २ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य, कौणपदंत की उक्त दलील को स्वीकार नहीं करते हैं । उनका कहना है कि 'सेना का सारा दारोमदार कोष पर ही निर्भर है । उसके अभाव में या तो सेना शत्रु के अधीन हो जाती है या अपने ही स्वामी का वध कर डालती है । सब सामंतों के साथ सेना ही राजा का विरोध करा सकती है; क्योंकि धन देने पर सभी को वश में किया जा सकता है । लोक में धर्म, अर्थ और काम, इस त्रिवर्ग के साधन का मूल कारण कोष ही है; किन्तु इस संबंध में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि देश, काल तथा कार्य को दृष्टि में रखकर कोष और सेना, दोनों को प्रधान माना जा सकता है, जिनके द्वारा कि विजिगीषु का कार्य सध सके । सेना केवल कोष की रक्षा कर सकती है; किन्तु कोष से दुर्ग और सेना, दोनों की रक्षा हो जाती है । इसलिए सभी दुर्ग आदि द्रव्य प्रकृतियों की