कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १२७ : अ० १ ] प्रकृति-व्यसन-वर्ग ५६१
(१) शेषप्रकृतिनाशस्तु यत्रैकव्यसनाद्भवेत् । व्यसनं तद्गरीयः स्यात्प्रधानस्येतरस्य वा ॥
इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे प्रकृतिव्यसनवर्गो नाम प्रथमोऽध्यायः,
आदितः षोडशशततमः ।
एक के गुणशाली और दूसरे के गुणहीन होने पर ही विशेषता समझनी चाहिए, किन्तु जिस प्रकृति पर व्यसन है उसके अतिरिक्त शेष सभी प्रकृति यदि अपनी-अपनी अवस्था में शक्तिशाली बनी रहें तो पूर्वोक्त विशेषता नहीं समझनी चाहिए ।
( १ ) यदि एक प्रकृति-व्यसन के कारण शेष प्रकृतियों का भी नाश होता हो, तो वह व्यसन भले ही प्रधान-अप्रधान किसी भी प्रकृति से संबद्ध क्यों न हो, पहिले उसी व्यसन का प्रतीकार करना चाहिए ।
व्यसनाधिकारिक नामक अष्टम अधिकरण में प्रकृतिव्यसनवर्ग नामक पहला अध्याय समाप्त ।
३६ कौ०