कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 646, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १२८ | # राजराज्ययोर्व्यसनचिन्ता |
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| अध्याय २ |
(१) राजा राज्यमिति प्रकृतिसंक्षेपः । (२) राज्ञ आभ्यन्तरो बाह्यो वा कोप इति । अहिभयादाभ्यन्तरः कोपो बाह्यकोपात्पापीयान् । अन्तरमात्यकोपश्चान्तःकोपात् । तस्मात्कोशदण्ड-शक्तिमात्मसंस्थां कुर्वीत । (३) द्वैराज्यवैराज्ययोर्द्वैराज्यमन्योन्यपक्षद्वेषानुरागाभ्यां परस्परसंघर्षेण वा विनश्यति । वैराज्यं तु प्रकृतिचित्तग्रहणापेक्षि यथास्थितमन्यैर्भुज्यत इत्याचार्याः । (४) नेति कौटिल्यः । पितापुत्रयोर्भ्रात्रोर्वा द्वैराज्यं तुल्ययोगक्षेमम-मात्यावग्रहं वर्तयेतेति । वैराज्ये तु जीवतः परस्याच्छिद्य 'नैतन्मम' इति
राजा और राज्य के व्यसनों पर विचार
(१) प्रकृति का संक्षिप्त स्वरूप राजा और राज्य है ।
(२) राजा के प्रति राज्य का दो प्रकार से कोप होता है : आभ्यन्तर और बाह्य । घर में रहने वाले साँप की तरह आभ्यन्तर कोप बाह्य कोप की अपेक्षा बहुत ही अनर्थकारी होता है । यह आभ्यन्तर कोप भी दो प्रकार का है : एक अन्तर अमात्य-कोप और दूसरा बाह्य अमात्य-कोप । इन दोनों में अन्तर अमात्य-कोप बहुत ही खतरनाक होता है । इसलिए विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह कोष और सेना की सम्पूर्ण शक्ति को अपने ही हाथ में रखे ।
(३) पूर्वाचार्यों का मत है कि 'द्वैराज्य (जिस राज्य के दो राजा हों) और वैराज्य (जिस राज्य में किसी विजित राजा का शासन हो), इन दोनों में दो राजाओं के पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्य एवं स्पर्धा के कारण द्वैराज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है; किन्तु प्रजा के विचारों के अनुसार चलाये जाने वाला वैराज्य हमेशा अपनी स्थिति को बनाये रखता है ।'
(४) किन्तु कौटिल्य का कहना है 'क्योंकि पिता, पुत्र तथा दो भाइयों में दायभाग सम्बन्धी विरोध के कारण ही द्वैराज्य की स्थापना होती है, जिसमें दोनों शासकों का योग-क्षेम समान होता है; उनके अमात्यों द्वारा दोनों राजाओं का पारस्परिक वैमनस्य शान्त हो सकता है । इस दृष्टि से द्वैराज्य में कोई बड़ा दोष