भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 648, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 648

५६४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । व्याधितो राजा यथाप्रवृत्तं राजप्रणिधिमनुवर्तयति । नवस्तु राजा 'बलावर्जितं ममेदं राज्यम्' इति यथेष्टमनवग्रहश्चरति । सामुत्थायिकैरवगृहीतो वा राज्योपघातं मर्षयति । प्रकृतिष्वरूढः सुखः समुच्छेत्तुं भवति । व्यधिते विशेषः—पापरोग्यपापरोगी च । (२) नवेऽप्यभिजातोऽनभिजात इति । दुर्बलोऽभिजातो बलवाननभिजातो राजेति । दुर्बलस्याभिजातस्योपजापं दौर्बल्यापेक्षाः प्रकृतयः कृच्छ्रेणोपगच्छन्ति । बलवतश्चानभिजातस्य बलापेक्षाः सुखेन इत्याचार्याः । (३) नेति कौटिल्यः । दुर्बलमभिजातं प्रकृतयः स्वयमुपनमन्ति, जात्यमैश्वर्यप्रकृतिरनुवर्तत इति । बलवतश्चानभिजातस्योपजापं विसंवादयन्ति—अनुरागे सार्वगुण्यमिति ।


(१) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है 'क्योंकि व्याधिग्रस्त राजा पूर्ववत् ही राज्य के व्यापारों को बराबर चलाता रहता है; किन्तु नया राजा तो बल के अभिमान से चूर होकर 'यह मेरा राज्य है' ऐसा समझता हुआ स्वेच्छाचारी बन कर मनमाना शासन करता है। अथवा जब कभी उन्नतिशील साथी राजाओं से घिर जाता है तो राज्य के नाश को चुपचाप देखता रहता है। प्रजा का अनुराग न होने से अनायास ही शत्रुओं के द्वारा उखाड़ दिया जाता है। इसलिए नये राजा की अपेक्षा व्याधिग्रस्त राजा ही श्रेष्ठ है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक विशेष बात ध्यान रखने योग्य यह है कि व्याधिग्रस्त राजा भी दो तरह के हो सकते हैं : एक तो पापरोग (कोढ़) आदि से ग्रस्त और दूसरे अपाप रोग (साधारण रोग) से ग्रस्त । इनमें अपापरोगी राजा के सम्बन्ध में ही उक्त कथन को समझना चाहिए।'

(२) नये राजाओं में भी उच्च कुलीन राजा उत्तम होता है या नीच कुलीन ? उनमें भी उच्च कुल का दुर्बल राजा उत्तम होता है या नीच कुल का बलवान् राजा ? इस सम्बन्ध में प्राचीन आचार्यों का कहना है कि 'कुलीन दुर्बल राजा के अमात्य आदि प्रकृतिजन तथा प्रजाजन बड़ी कठिनाई से उसके वश में रहते हैं। किन्तु नीच कुलोत्पन्न, परन्तु बलवान् राजा के रोबदाब के कारण सम्पूर्ण प्रजा तथा अमात्य आदि उसके वश में हो जाते हैं। इसलिए दुर्बल अभिजात राजा ही श्रेष्ठ है।'

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का उक्त मत के विरुद्ध यह कहना है कि 'जो राजा उच्च कुलोत्पन्न होता है, वह चाहे दुर्बल भी हो, प्रकृतिजन अपने-आप ही उसके सामने झुक जाते हैं; क्योंकि ऐश्वर्य की योग्यता उच्च कुलोत्पन्न राजा का ही अनुगमन करती है। किन्तु बलवान् होने पर भी नीचकुलोत्पन्न राजा के प्रकृतिजन विराग के कारण उसका विरोध करने लगते हैं; क्योंकि अनुराग ही गुणों का आश्रय है।'