भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १२८ : अ० २ ] राजा और राज्य के व्यसन ५६५

(१) प्रयासवधातस्सस्यवधो मुष्टिवधात्पापीयान् ।
(२) निराजीवत्वादवृष्टिरतिवृष्टित इति ।
(३) द्वयोर्द्वयोर्व्यसनयोः प्रकृतीनां बलाबलात् ।
पारम्पर्यक्रमेणोक्तं याने स्थाने च कारणम् ॥

इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे राजराज्ययोर्व्यसनचिन्ता नाम द्वितीयोऽध्यायः; आदितोः सप्तदशशततमः ।

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( १ ) खेत में बीज न बोने के कारण अन्नाभाव से जो कष्ट होता है उसकी अपेक्षा बीज बोने के बाद तैयार हुए अनाज का नष्ट हो जाना अधिक पीड़ाकर होता है । क्योंकि सारा परिश्रम ही व्यर्थ चला जाता है ।

( २ ) इसी प्रकार अधिक वृष्टि होने की अपेक्षा वृष्टि का सर्वथा न होना अधिक हानिकर है; क्योंकि जीवन की रक्षा जल पर ही निर्भर होती है ।

( ३ ) इस प्रकार दो भिन्न-भिन्न व्यसनों में प्रकृतियों के वलावल का निरूपण किया जा चुका है । इसका स्पष्टीकरण इस तरह है : विजिगीषु और शत्रु पर व्यसन होने के कारण, यदि शत्रु की अपेक्षा विजिगीषु पर लघु व्यसन हो तो विजिगीषु को चढ़ाई कर देनी चाहिए; और यदि अवस्था इसके विपरीत हो तो विजिगीषु को चुपचाप होकर बैठ जाना चाहिए ।

व्यसनाधिकारिक नामक अष्टम अधिकरण में राजराज्यव्यसनचिन्ता नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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