कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १२९ | पुरुषव्यसनवर्गः |
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| अध्याय ३ |
(१) अविद्याविनयः पुरुषव्यसनहेतुः। अविनीतो हि व्यसनदोषान्न पश्यति।
(२) तानुपदेक्ष्यामः—कोपजस्त्रिवर्गः, कामजश्चतुर्वर्गः।
(३) तयोः कोपो गरीयान्। सर्वत्र हि कोपश्चरति, प्रायशश्च कोपवशा राजानः प्रकृतिकोपैर्र्हताः श्रूयन्ते, कामवशाः क्षयव्ययनिमित्तमरिव्याधिभिरिति।
(४) नेति भारद्वाजः। सत्पुरुषाचारः कोपः। वैरयातनमवज्ञावधो भीतमनुष्यता च, नित्यश्च कोपसम्बन्धः पापप्रतिषेधार्थः। कामः सिद्धिलाभः। सान्त्वं त्यागशीलता सम्प्रियभावश्च। नित्यश्च कामेन सम्बन्धः कृतकर्मणः फलोपभोगार्थ इति।
सामान्य पुरुषों के व्यसन
(१) अशिक्षित व्यक्ति व्यसनी हो जाते हैं, क्योंकि अशिक्षित व्यक्ति व्यसनों से पैदा होने वाले दोषों को नहीं समझ पाता है।
(२) इस प्रकरण में ऐसे ही व्यसनों तथा व्यसनों से पैदा होने वाले दोषों का निरूपण किया जाता है। कोप से उत्पन्न होने वाले तीन दोष होते हैं, इसीलिए उन्हें त्रिवर्ग कहा गया है। इसी प्रकार काम से उत्पन्न होने वाले चार दोष हैं, इसीलिए उन्हें चतुर्वर्ग कहा गया है।
(३) दोषों को उत्पन्न करने वाले काम और क्रोध दोनों में से क्रोध ही अधिक भयावह होता है, क्योंकि क्रोध का सर्वत्र प्रवेश है। प्रायः ऐसा सुना गया है कि कोप से वशीभूत हुए राजा अपनी प्रकृतियों के कोप से ही मारे गये। इसी प्रकार काम के वशीभूत हुए राजा, सेना तथा कोष के नष्ट हो जाने या शारीरिक शक्ति के नष्ट हो जाने के कारण शत्रुओं तथा व्याधियों के द्वारा मारे गये सुने गये हैं।
(४) इस सिद्धान्त के विपरीत आचार्य भारद्वाज का कथन है 'क्योंकि कोप करना श्रेष्ठ लोगों का आचारधर्म है। कोप से ही शत्रु का प्रतिकार और दूसरे के तिरस्कार का बदला लिया जाता है। क्रोधी पुरुष की बुराई करने से सभी लोग डरते हैं। क्रोध छोड़ा भी नहीं जा सकता है, क्योंकि उसी के द्वारा पापियों का