भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 651

प्र० १२९ : अ० ३ ] सामान्य पुरुषों के व्यसन ५६७

(१) नेति कौटिल्यः । द्वेष्यता शत्रुवेदनं दुःखासङ्गश्च कोपः । परिभवो द्रव्यनाशः पाटच्चरद्यूतकारलुब्धकगायनवादकैश्चानर्थैः संयोगः कामः । (२) तयोः परिभवाद् द्वेष्यता गरीयसी । परिभूतः स्वैः परैश्चावगृह्यते, द्वेष्यः समुच्छिद्यत इति । द्रव्यनाशाच्छत्रुवेदनं गरीयः, द्रव्यनाशः कोशा-बाधकः, शत्रुवेदनं प्राणाबाधकमिति । अनर्थसंयोगाद् दुःखसंयोगो गरी-यान् । अनर्थसंयोगो मुहूर्त्तप्रीतिकरः, दीर्घक्लेशकरो दुःखानामासङ्ग इति । तस्मात्कोपो गरीयान् । (३) वाक्पारुष्यमर्थदूषणं दण्डपारुष्यमिति । वाक्पारुष्यर्थदूषणयो-


निग्रह होता है। इसी प्रकार काम भी सुख को देनेवाला है और उसी के कारण व्यक्ति में सच्चाई, मधुरता, त्याग और सौम्यता जैसे गुण आ बसते हैं। इसके अतिरिक्त अपने कर्मों का फल भोगने के लिए प्रत्येक पुरुष के लिए काम का अवलंबन आवश्यक भी है।'

( १ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य उक्त मत को स्वीकार नहीं करते । उनका कहना है कि 'कोप और काम कदापि गुणों की कोटि में नहीं रखे जा सकते हैं, वे तो अनेक महान् अनर्थों को पैदा करने वाले हैं, कोप के कारण मनुष्य सबका द्वेषी बन जाता है, उसके अनेक शत्रु बन जाते हैं, दुःख उसके शिर पर मँडराया करते हैं, कामी पुरुष का सर्वत्र तिरस्कार होता है, वह धन-नाश करता है, चोर, जुआरी, शराबी आदि अनर्थकारी व्यक्तियों से उसका साथ होता है।'

( २ ) काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले दोषों में से, कामजन्य परिभव ( दोष ) की अपेक्षा क्रोधजन्य द्वेष्यता अधिक हानिकर होती है। तिरस्कृत व्यक्ति अपने या पराये लोगों के द्वारा कभी न कभी अनुगामी बनाया जा सकता है, किन्तु जिससे सभी लोग द्वेष करते हैं वह तो नष्ट ही हो जाता है। इसीलिए तिरस्कृत होने की अपेक्षा द्वेष्य होना अधिक कष्टकर है। द्रव्यनाश हो जाने की अपेक्षा अधिक शत्रुओं का पैदा हो जाना अधिक हानिकर है। द्रव्यनाश होने पर केवल कोष को बाधा पहुँचती है, प्राण सुरक्षित रहते हैं, किन्तु शत्रुओं के बढ़ जाने से प्राण खतरे में पड़ जाते हैं। अनर्थकारी व्यक्तियों से सम्पर्क होने की अपेक्षा दुःखों का संयोग अधिक कष्टकर है। चोर, जुआरी आदि अनर्थकारी व्यक्तियों के सम्बन्ध परिणाम में दुःखदायी होने के बावजूद भी थोड़े समय के लिए प्रसन्न कर देने वाले होते हैं, किन्तु दुःखों का सम्बन्ध लगातार कष्टदायक होता है। इसलिए कामजन्य दोषों की अपेक्षा क्रोधजन्य दोषों को ही अधिक हानिकर समझना चाहिए।

( ३ ) कोपजन्य त्रिवर्ग : वाक्पारुष्य, अर्थदूषण और दण्डपारुष्य, ये कोपज त्रिवर्ग हैं, आचार्य विशालाक्ष के मत से 'वाक्पारुष्य ही अधिक बलवान् है। क्योंकि