कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १२९ : अ० ३ ] सामान्य पुरुषों के व्यसन ५६९
दिङ्मोहाः क्षुत्पिपासे च प्राणाबाधस्तस्याम् । द्यूते तु जितमेवाक्षविदुषा यथा जयत्सेनदुर्योधनाभ्यामिति ।
(१) नेति कौटिल्यः । तयोरप्यन्यतरपराजयोऽस्तीति नलयुधिष्ठि-राभ्यां व्याख्यातं, तदेव विजितद्रव्यमामिषं, वैरबन्धश्च, सतोऽर्थस्य विप्रति-पत्तिरसच्चार्जनमप्रतिभुक्तनाशो मूत्रपुरीषधारणबुभुक्षादिभिश्च व्याधिलाभ इति द्यूतदोषः । मृगयायां तु व्यायामः श्लेष्मपित्तमेदःस्वेदनाशलश्चले स्थिरे च काये लक्षपरिचयः कोपभयस्थानेहितेषु च मृगाणां चित्तज्ञानमनित्ययानं चेति ।
(२) द्यूतस्त्रीव्यसनयोः कैतवव्यसनम् इति कौणपदन्तः । सातत्येन हि निशि प्रदीपे मातरि च मृतायां दीव्यत्येव कितवः, कृच्छ्रे च प्रतिपृष्टः
दोष है । 'इस कामजन्य चतुर्वर्ग में मृगया और द्यूत, इन दोनों में से मृगया दोष अधिक हानिकर होता है'—ऐसा आचार्य नारद ( पिशुन ) का कहना है । 'क्योंकि मृगया दोष में सर्वथा चोर, शत्रु, सांप, दावाग्नि और गिरने का भय बना रहता है, दिशाओं के भूल जाने से तथा भूख-प्यास से कभी-कभी प्राणान्तक कष्ट भी उपस्थित हो जाता है । परन्तु बढ़िया खिलाड़ी जुए में अवश्य ही विजयी होता है, जैसे जयत्सेन और दुर्योधन ने नल और युधिष्ठिर को जुए में जीत लिया था । इसलिए जुए की अपेक्षा शिकार में अधिक कष्ट है ।'
( १ ) किन्तु उक्त सिद्धान्त के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'मृगया की भांति जुए में भी अनेक दोष हैं । जुआ खेलने वालों में एक की अवश्य ही हार होती है, जैसे नल और युधिष्ठिर जुए में हार गए थे । जुए में जीता हुआ धन पराये मांस की तरह है और हारने वाला जुआरी जीते हुए जुआरी से वैर भी ठान लेता है । धर्मपूर्वक कमाये हुए धन का दुरुपयोग होता है और अधर्मपूर्वक जुए से धन का संग्रह होता है । संग्रह किया हुआ धन फिर जुए में ही गँवा दिया जाता है । जुआ खेलते समय पेशाब, पाखाना और भूख रोकने से अनेक बीमारियां हो जाती हैं । जुए की अपेक्षा मृगया में व्यायाम, कफ-पित्त का नाश, मेदा का न बढ़ना, पसीना निकलने से देह का हल्का होना, चलते हुए या बैठे हुए शरीर पर निशाना बाँधने का अभ्यास होना, क्रोध तथा भय से उत्पन्न होने वाले जंगली जानवरों के चित्त की भिन्न-भिन्न चेष्टाओं का ज्ञान होना और किसी खास अवसर पर ही मृगया का समय निश्चित होना—ये सब गुण ऐसे हैं, जो द्यूत में असम्भव है ।'
( २ ) आचार्य कौणपदंत का मत है कि 'द्यूत-व्यसन और स्त्री-व्यसन, दोनों में द्यूत-व्यसन अधिक हानिकर है, क्योंकि जुआरी रात में भी दीपक जला कर जुआ खेलता है, माता के मर जाने पर उसकी दाहक्रिया आदि की कुछ भी परवाह न