भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 654

५७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

कुप्यति। स्त्रीव्यसनेषु तु स्नानप्रतिकर्मभोजनभूमिषु भवत्येव धर्मार्थपरि- प्रश्नः। शक्या च स्त्री राजहिते नियोक्तुम्। उपांशुदण्डेन व्याधिना वा व्यावर्तयितुमवस्त्रावयितुं वा इति।

(१) नेति कौटिल्यः। सप्रत्यादेयं द्यूतम्, निष्प्रत्यादेयं स्त्रीव्यसनम्। अदर्शनं, कार्यनिर्वैदः, कालातिपाटनादनर्थधर्मलोपश्च, तन्त्रदौर्बल्यं, पाना- नुबन्धश्चेति।

(२) स्त्रीपानव्यसनयोः स्त्रीव्यसनम् इति वातव्याधिः। स्त्रीषु हि बालिश्यमनेकविधं निशान्तप्रणिधौ व्याख्यातम्। पाने तु शब्दादीनामिन्द्रि- यार्थानामुपभोगः प्रीतिदानं परिजनपूजनं कर्मश्रमवधश्चेति।

करके जुए में जुटा हुआ रहता है और किसी संकट कालीन स्थिति में उससे जब कोई कुछ कहना चाहता है तो वह कुपित हो जाता है। इसके विपरीत स्त्री-व्यसनी राजा से स्नान के समय वस्त्र पहनते हुए या भोजन आदि के समय धर्म-अर्थ के सम्बन्ध में पूछा तथा बतलाया जा सकता है, जिस स्त्री पर राजा आसक्त हो उसको भी अमात्यों के द्वारा राजा के ध्येय कार्यों की ओर मोड़ा जा सकता है। यदि वह स्त्री अमात्यों का कहना न माने तो उसका उपांशुवध भी कराया जा सकता है। यदि ऐसा भी सम्भव न हो तो विषयुक्त औषधियों से उसमें व्याधि उपजा कर इलाज के बहाने उसको दूसरी जगह भेजा जा सकता है। इसलिए स्त्री-व्यसन की अपेक्षा द्यूत-व्यसन ही अधिक हानिकर है।'

( १ ) किन्तु उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'जुए में जो चीज हार दी जाय उसको फिर जुए में ही जीता जा जा सकता है; किन्तु स्त्री व्यसन में तो जो चीज हाथ से निकल गई उसका वापिस मिलना सम्भव नहीं होता है। स्त्री-व्यसन में आसक्त राजा अपने मन्त्रियों तक से नहीं मिल पाता है, जिसकी वजह से मन्त्रिवर्ग भी राजकार्य की ओर उदासीन हो जाता है और इस प्रकार कुछ समय बाद राजा के अर्थ-धर्म, दोनों ही विलुप्त हो जाते हैं।। इतना ही नहीं, उसका राज्यतन्त्र भी दुर्बल हो जाता है। स्त्री-व्यसन के सहकारी व्यसन मद्यपान, जुआ आदि भी उसके पीछे लग जाते हैं। इसलिए द्यूत-व्यसन की अपेक्षा स्त्री-व्यसन ही अधिक हानिकर समझना चाहिए।

( २ ) आचार्य वातव्याधि के मत से 'स्त्री-व्यसन और मद्यपान, दोनों में से स्त्री-व्यसन ही अधिक कष्टकर है; क्योंकि स्त्रियों में अनेक प्रकार की मूर्खताएँ होती हैं, जिनका वर्णन पीछे निशांतप्रणिधि प्रकरण में किया गया है; यहाँ तक कि वे अपने पतियों के वध करने तक का षड्यन्त्र रच देती हैं। मद्यपान में तो इन्द्रियों के विषयभूत शब्द आदि का ही उपयोग किया जाता है। उससे प्रेम का विस्तार, तथा