भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 655

प्र० १२९ : अ० ३ ] सामान्य पुरुषों के व्यसन ५७१

(१) नेति कौटिल्यः । स्त्रीव्यसने भवत्यपत्योत्पत्तिरात्मरक्षणं चान्त- र्दारिषु, विपर्ययो वा बाह्येषु, अगम्येषु सर्वोच्छित्तिः । तदुभयं पानव्यसने । पानसम्पत्—संज्ञानाशः अनुन्मत्तस्योन्मत्तत्वमप्रेतस्य प्रेतत्वं कौपीनदर्शनं श्रुतप्रज्ञाप्राणवित्तमित्रहानिः सद्भिर्वियोगोऽनर्थ्यसंयोगस्तन्त्रीगीतनैपुण्येषु चार्थघ्नेषु प्रसङ्ग इति ।

(२) द्यूतमद्ययोद्यूंतमेकेषाम् । पणनिमित्तो जयः पराजयो वा, प्राणिषु निश्चेतनेषु वा पक्षद्वैधेन प्रकृतिकोपं करोति, विशेषतश्च सङ्घानां सङ्घ- धर्मिणां च राजकुलानां द्यूतनिमित्तो भेदः, तन्निमित्तो विनाश इति। असत्प्रग्रहः पापिष्ठतमो व्यसनानां तन्त्रदौर्बल्यादिति ।


तथा परिजनों का सत्कार करने की प्रवृत्ति बढ़ती है और अधिक कार्य करने से उत्पन्न थकावट दूर हो जाती है। इसलिए मद्यपान की अपेक्षा स्त्री-व्यसन अधिक दुःखदायी है।'

( १ ) किन्तु उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'यदि स्त्री-व्यसन अपनी पत्नियों तक ही सीमित है तब तो पुत्रों को पैदा कर उनके द्वारा आत्म-रक्षा होना, यह तो लाभ की ही बात है। यदि वह व्यसन गणिका आदि स्त्रियों में हो तो उससे उक्त लाभ नहीं होता और यदि वह अन्य कुलीन स्त्रियों तक असीमित हो जाय तो उससे राजा का सर्वनाश हो जाता है; इसीलिए बाह्य स्त्रियों और कुलीन स्त्रियों में आसक्ति होने के कारण ही स्त्री-व्यसन को सदोष माना गया है। किन्तु मद्यपान-व्यसन में न तो पुत्र आदि के पैदा होने की कोई सम्भावना है और उसमें सर्वनाश का ही अधिक खतरा रहता है। इसके अतिरिक्त मद्यपान करने से नीचे लिखे अनेक दोष पैदा हो जाते हैं : विवेक-बुद्धि नष्ट हो जाती है; अच्छा व्यक्ति भी उन्मत्त के समान हो जाता है; जीता हुआ भी मरे हुए के समान निश्चेष्ट हो जाता है; उसके गुप्तपापों का पता लग जाता है, उसका शास्त्रज्ञान तथा उसकी संस्कृत बुद्धि, बल, धन और मित्र आदि सभी वस्तुओं का विनाश हो जाता है, सज्जनों की संगति से वह दूर हो जाता है, सर्वदा अनर्थकारी व्यक्तियों से उसका संसर्ग हो जाता है, धन को नष्ट करने वाले गीत, वाद्य आदि में उसकी प्रवृत्ति हो जाती है।'

( २ ) कुछ आचार्यों का कहना है कि 'द्यूत और मद्य, इन दोनों व्यसनों में से द्यूत ही अधिक कष्टकर है, क्योंकि दाव लगाने पर जय तथा पराजय और प्राणी तथा अप्राणी विषयक द्यूतों में परस्पर विरुद्ध दो पक्षों का वैर हो जाने के कारण प्रकृतियों में कोप को पैदा कर देते है और विशेषतः एक साथ रहने वाले एक विचार-बुद्धि के राजकुलों में भी द्यूत के कारण परस्पर मतभेद हो जाता है, जिससे कि उनका विनाश हो जाता है। यह असत्प्रग्रह ( जिस व्यसन में दुर्जनों का सत्कार