कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५७२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ आठवाँ अधिकरण |
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(१) असतां प्रग्रहः कामः कोपश्चावग्रहः सताम् ।
व्यसनं दोषबाहुल्यादत्यन्तमुभयं मतम् ॥
(२) तस्मात्कोपं च कामं च व्यसनारम्भमात्मवान् ।
परित्यजेन्मूलहरं वृद्धसेवी जितेन्द्रियः ॥
इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे पुरुषव्यसनवर्गो नाम तृतीयोऽध्यायः;
आदितोऽष्टाविंशतिशततमः ।
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किया जाता है ) अर्थात् मद्यपान व्यसन अन्य सभी व्यसनों में अत्यन्त पापिष्ठ है, क्योंकि उससे सारी राज्य-व्यवस्था दुर्बल हो जाती है ।
( १ ) काम और क्रोध, ये दोनों ही गाने-बजाने का व्यवसाय करने वाले दुर्जनों के सत्कार के हेतु तथा सज्जनों के तिरस्कार के हेतु होते हैं । दोषों की अधिकता के कारण काम-क्रोध को महान् व्यसन माना गया है ।
( २ ) इसलिए धैर्यशाली, वृद्धसेवी और जितेन्द्रिय राजा को चाहिए कि वह, प्राणों तक का नाश करने वाले तथा दुःखोत्पादक काम और क्रोध का सर्वथा परित्याग कर दे ।
व्यसनाधिकारिक नामक आठवें अधिकरण में पुरुषव्यसनवर्ग नामक तीसरा अध्याय समाप्त ॥
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