भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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५७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवाँ अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः—एकदेशपीडनो व्याधिः शक्यप्रतीकारश्च, सर्वदेश-पीडनं दुर्भिक्षं प्राणिनामजीवनायेति । (२) तेन मरको व्याख्यातः । (३) क्षुद्रकमुख्यक्षययोः क्षुद्रकक्षयः कर्मणामयोगक्षेमं करोति, मुख्य-क्षयः कर्मानुष्ठानोपरोधधर्मा इत्याचार्याः । (४) नेति कौटिल्यः । शक्यः क्षुद्रकक्षयः प्रतिसन्धातुं बाहुल्यात् क्षुद्र-काणां, न मुख्यक्षयः । सहस्रेषु हि मुख्यो भवत्येको न वा सत्त्वप्रज्ञाधिक्या-दाश्रयत्वात् क्षुद्रकाणामिति । (५) स्वचक्रपरचक्रयोः स्वचक्रमतिमात्राभ्यां दण्डकराभ्यां पीडयत्य-शक्यं च वारयितुं, परचक्रं तु शक्यं प्रतियोद्धुमपसारेण सन्धिना वा मोक्ष-यितुमित्याचार्याः । (६) नेति कौटिल्यः । स्वचक्रपीडनं प्रकृतिपुरुषमुख्योपग्रहविघाताभ्यां


( १ ) किन्तु कौटिल्य पूर्वाचार्यों के मत को युक्तिसंगत नहीं मानता है । वह कहता है कि 'व्याधि से किसी एक ही देश की हानि होती है और औषधि आदि के द्वारा उसका प्रतीकार भी किया जा सकता है । किन्तु दुर्भिक्ष के कारण सारा राष्ट्र पीडित हो जाता है और प्राणिमात्र का जीवन संकट में पड़ जाता है ।'

( २ ) इसी प्रकार महामारी के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।

( ३ ) प्राचीन आचार्यों का विचार है कि 'छोटे कर्मचारियों और प्रमुख कार्य-कर्ताओं में से छोटे कर्मचारियों का क्षय होना अधिक हानिकर है, क्योंकि कर्मचारियों के अभाव में कार्यों का योग-क्षेम सिद्ध नहीं होता है । किन्तु प्रमुख कार्यकर्ताओं का क्षय केवल कार्य की निगरानी में ही बाधा डाल सकता है ।

( ४ ) किन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'छोटे कर्मचारियों की कमी को दूसरी नियुक्तियां कर के पूरा किया जा सकता है, किन्तु प्रमुख कार्यकर्ता हजारों में से एक मिलता है या कभी-कभी वह भी नहीं मिलता, अपने बल-बुद्धि की अधिकता के के कारण छोटे कर्मचारियों का वह आश्रय होता है ।'

( ५ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि स्वचक्र ( अपने देश का विप्लव ) और परचक्र ( दूसरे देश द्वारा विप्लव ), इन दोनों में से स्वचक्र ही अधिक भयङ्कर होता है, क्योंकि वह जुर्माना एवं टैक्स आदि के द्वारा प्रजा को पीड़ित करता है और अपने ही देश का होने के कारण उसका प्रतीकार भी नहीं किया जा सकता है, किन्तु परचक्र का प्रतीकार, उस देश को छोड़ देने से भी किया जा सकता है या कुछ धन देकर भी सन्धि की जा सकती है ।'

( ६ ) किन्तु कौटिल्य का कथन है कि 'स्वचक्र की पीड़ा का प्रतीकार अमात्य