कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १३०-१३२ : अ० ४ ] पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग, कोषसंगवर्ग ५७५
शक्यते वारयितुम्, एकदेशं वा पीडयति । सर्वदेशपीडनं तु परचक्रं विलोपघातदाहविध्वंसनापवाहनैः पीडयतीति ।
(१) प्रकृतिराजविवादयोः प्रकृतिविवादः प्रकृतीनां भेदकः पराभियोगानावहति । राजविवादस्तु प्रकृतीनां द्विगुणभक्तवेतनपरिहारकरो भवतीत्याचार्याः ।
(२) नेति कौटिल्यः । शक्यः प्रकृतिविवादः प्रकृतिमुख्योपग्रहेण कलहस्थानापनयनेन वा वारयितुं, विवदमानास्तु प्रकृतयः परस्परसंघर्षेणोपकुर्वन्ति । राजविवादस्तु पीडनोच्छेदनाय प्रकृतीनां द्विगुणव्यायामसाध्य इति ।
(३) देशराजविहारयोर्देशविहारस्त्रैकाल्येन कर्मफलोपघातं करोति, राजविहारस्तु कारुशिल्पिकुशीलववाग्जीवनरूपाजीवावैदेहकोपकारं करोति इत्याचार्याः ।
आदि मुख्य व्यक्तियों को अनुकूल बनाकर या उनका खातमा कर देने पर भी किया जा सकता है । स्वचक्र से किसी एक धन-धान्य सम्पन्न देश को ही पीड़ा पहुँचती है । किन्तु परचक्र के द्वारा तो लूटने, मारने, आग लगाने, अन्य प्रकार से पीड़ा पहुँचाने और अपने देश से निकाल देने आदि द्वारा अनेक प्रकार की पीड़ाएँ सारे राष्ट्र को उठानी पड़ती है ।'
( १ ) आचार्यों का मत है कि 'प्रकृतिविवाद और राजविवाद, इन दोनों में से प्रकृति-विवाद ही अधिक हानिकर होता है, क्योंकि वह अमात्य आदि में परस्पर फूट डालने वाला और शत्रु के कार्यों को सहारा देने वाला होता है । परन्तु राज-विवाद के कारण प्रकृतियों का दुगुना वेतन, भत्ता बढ़ जाता है और प्रजा के सारे कर माफ कर दिये जाते हैं ।'
( २ ) किन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'अमात्य आदि मुख्य प्रकृतियों को अनुकूल बनाकर और कलह के कारणों को मिटा देने से प्रकृति-विवाद को शान्त किया जा सकता है । दूसरी बात यह भी है कि परस्पर विरुद्ध प्रकृति जन स्पर्धावश राजा का उपकार ही करते हैं । किन्तु प्रजा की सारी शक्ति और सम्पूर्ण समृद्धि राजविवाद में नष्ट हो जाती है । उसको शान्त करने के लिए दुगुना यत्न करना पड़ता है ।'
( ३ ) प्राचीन आचार्यों का कहना है कि 'देश-विहार ( हँसी-खेल में फँसा हुआ देश ) और राजविहार ( हँसी-खेल में फँसा हुआ राजा ), इन दोनों में से देशविहार अधिक हानिकर होता है; क्योंकि प्रजाजनों के खेल-कूद में फँसे रहने के कारण कृषि-कार्यों के क्रम में विघ्न हो जाता है । किन्तु राज-विहार से संबद्ध बढ़ई, सुनार, गाने वाले, भाट, वेश्या और व्यापारी आदि व्यक्तियों का बड़ा भला होता है ।'